ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1840, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे धनी इंद्र! राजा सोम एवं वरुण के धर्म तथा बृहस्पति संबंधी यज्ञशाला में वर्तमान मैं तुम्हारी स्तुति में संलग्न हूं. हे धाता और विधाता! मैंने तुम्हारी आज्ञा से कलश में रखा सोम पिया है. (३) प्रसूतो भक्षमकरं चरावपि स्तोमं चेमं प्रथमः सूरिरुन्मृजे. सुते सातेन यद्यागमं वां प्रति विश्वामित्रजमदग्नी दमे.. (४) हे इंद्र! मैंने तुमसे प्रेरित होकर यज्ञ में पुरोडाश तैयार किया है. मैं सर्वप्रथम स्तोता के रूप में यह स्तोत्र बोलता हूं. (इंद्र का उत्तर) हे विश्वामित्र एवं जमदग्नि! सोमरस तैयार होने पर मैं जिस समय तुम्हारे पास आऊं, उस समय तुम अपने घर में मेरी स्तुति करना. (४) सूक्त—१६८ देवता—वायु वातस्य नु महिमानं रथस्य रुजन्नेति स्तनयन्नस्य घोषः. दिविस्पृग्यात्यरुणानि कृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन्.. (१) मैं रथ के समान वेग से दौड़ने वाले वायु की महिमा का वर्णन करता हूं. वायु का शब्द सभी स्थानों में गुंजित होता हुआ एवं वृक्षादि को कंपाता हुआ चलता है. वायु आकाशमार्ग का स्पर्श करके सभी स्थलों को लाल करते हुए एवं धरती की धूल उड़ाते हुए चलते हैं. (१) सं प्रेरते अनु वातस्य विष्ठा ऐनं गच्छन्ति समनं न योषाः. ताभिः सयुक्सरथं देव ईयतेऽस्य विश्वस्य भुवनस्य राजा.. (२) वायु के चलने से पर्वत भी कांपते हैं. जिस प्रकार घोड़ी युद्ध की ओर जाती है, उसी प्रकार पर्वतादि वायु की ओर आते हैं. वायु घोड़ियों से युक्त रथ पर चढ़कर एवं इस सकल भुवन के स्वामी बनकर चलते हैं. (२) अन्तरिक्षे पथिभिरीयमानो न नि विशते कतमच्चनाहः. अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्व स्विज्जातः कुत आ बभूव.. (३) वायु आकाशस्थित मार्गों से चलते हुए किसी भी दिन शांति से नहीं बैठते. जलों के मित्र, सबसे प्रथम उत्पन्न एवं शक्तियुक्त वायु कहां जन्मे हैं और कहां से आए हैं? (३) आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः. घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम.. (४) देवों की आत्मा एवं भुवन के गर्भरूप वायु इच्छा के अनुसार विचरण करते हैं. जिस वायु का शब्द ही सुना जाता है, रूप नहीं देखा जाता, उसकी पूजा मैं हव्य द्वारा करता हूं. (४)