ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंनपुंसक भाग जाते हैं, उसी प्रकार वे इंद्र के द्वारा अपमानित होकर अपनी निर्बलता का विचार करते हुए सरल मार्गों से दूर भाग गए. (६) त्वमेतान्रुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे. अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः.. (७) हे इंद्र! वृत्र के कुछ अनुचर तुम्हारी हंसी उड़ा रहे थे और कुछ तुम्हारे भय से रो रहे थे. तुमने उन सभी से आकाश में युद्ध किया एवं दस्यु वृत्र को स्वर्ग से लाकर भली-भांति सपरिवार नष्ट कर दिया. इस प्रकार तुमने सोमरस तैयार करने वालों एवं स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा की. (७) चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः. न हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण.. (८) उन वृत्रानुचरों ने धरती को सब ओर से व्याप्त कर लिया था. वे स्वर्ण एवं मणियों से सुशोभित थे. वे इंद्र को नहीं जीत सके. यज्ञ में विघ्न डालने वाले उनको इंद्र ने सूर्य की सहायता से भगा दिया. (८) परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम्. अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्ब्रह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र.. (९) हे इंद्र! तुमने अपनी महिमा से धरती और आकाश को व्याप्त करके उनका भली प्रकार भोग किया है. जो यजमान मंत्रों का उच्चारण समझकर केवल पाठ करते थे, मंत्र उन्हें अपना समझकर उनकी रक्षा करते थे. ऐसे मंत्रों द्वारा तुमने उस चोर वृत्र को निकाल दिया. (९) न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन्. युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्ज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत्.. (१०) जब आकाश से धरती पर जल नहीं बरसा और धन देने वाली भूमि मानवोपकारक फसलों से युक्त नहीं थी, तब वर्षाकारक इंद्र ने अपने हाथ में वज्र उठाया और चमकते हुए वज्र की सहायता से अंधकार फैलाने वाले मेघ से नीचे गिरने वाला जल पूरी तरह दुहा. (१०) अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्यानाम्. सध्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून.. (११) इंद्र के स्वधा मंत्र के अनुसार पानी बरसने लगा. तब वृत्र उन नदियों के बीच में पहुंचकर बढ़ने लगा, जिनमें नाव चल सकती थी. इंद्र ने शक्तिशाली एवं प्राणसंहारक वज्र द्वारा उस स्थिर मन वाले वृत्र को कुछ ही दिनों में मार डाला. (११) न्याविध्यदिलीबिशस्य दृळ्हा वि शृङ्गिणमभिनच्छुष्णामिन्द्रः. ebook converter DEMO Watermarks*