ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयावत्तरो मघवन्द्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम्.. (१२) इंद्र ने धरती पर छिपी हुई वृत्र की सेना को पूरी तरह वेध दिया था एवं संसार को दुःखी करने वाले एवं सींग के समान आयुध वाले वृत्र को अनेक प्रकार से मारा था. हे इंद्र! तुम्हारे पास जितना वेग और बल है, उसके द्वारा तुमने युद्धाभिलाषी वृत्र को वज्र की सहायता से काट डाला. (१२) अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रुन्वितिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत्. सं वज्रेणासृजद्वृत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः.. (१३) इंद्र का कार्य सिद्ध करने वाला वज्र शत्रुओं पर गिरा था. इंद्र ने तीक्ष्ण एवं श्रेष्ठ वज्ररूपी आयुध से वृत्र के नगरों को तोड़ डाला था. इसके पश्चात् इंद्र ने अपना वज्र वृत्र पर चलाया और उसे मारते हुए भली-भांति अपना उत्साह बढ़ाया. (१३) आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम्. शफच्युतो रेणुर्नक्षत द्यामुच्छ्रैत्रेयो नृषाह्वाय तस्थौ.. (१४) हे इंद्र! तुम कुत्स ऋषि की स्तुति को पंसद करते थे. तुमने उनकी रक्षा की. तुमने युद्धरत एवं श्रेष्ठ गुणों वाले दशद्यु ऋषि की भी रक्षा की. तुम्हारे घोड़ों की टापों से उठी हुई धूल आकाश तक फैल गई थी. श्वैत्रेय ऋषि शत्रुओं के भय से पानी में छिप गए थे. मनुष्यों में श्रेष्ठ पद पाने की इच्छा से वे तुम्हारी कृपा के कारण ही बाहर निकले. (१४) आवः शमं वृषभं तुग्र्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छिव्र्यं गाम्. ज्योक् चिदत्र तस्थिवांसो अक्रञ्छत्रूयतामधरा वेदनाकः.. (१५) हे इंद्र! तुमने शांतचित्त, श्रेष्ठ गुण वाले एवं जलमग्न श्वैत्रेय को क्षेत्र प्राप्ति के उद्देश्य से बचाया था. जो लोग हमारे साथ बहुत दिनों से युद्ध कर रहे हैं एवं हमसे शत्रुता रखते हैं, तुम उन्हें वेदना और कष्ट दो. (१५) सूक्त—३४ देवता—अश्विनीकुमार त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वां याम उत रातिरश्विना. युवोर्हि यन्त्रं हिम्येव वाससोऽभ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभिः.. (१) हे बुद्धिमान् अश्विनीकुमारो! तुम हमारे लिए आज तीन बार आओ. तुम्हारे रथ और दान व्यापक हैं. जिस प्रकार रश्मियों वाला सूर्य शीतल रात्रि से संबंधित है, उसी प्रकार तुम दोनों का भी नियमित संबंध है. तुम कृपा करके विद्वानों के वश में हो जाओ. (१) त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः. ebook converter DEMO Watermarks*