भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 229

अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य. आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः.. (१) हे मरणरहित, सर्वभूतज्ञाता अग्नि! तुम हवि देने वाले यजमान के लिए उषा देवता के पास से लाकर टिकने योग्य एवं विभिन्न प्रकार का धन दो. उषाकाल में जागने वाले देवों को तुम आज यहां ले आना. (१) जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम्. सजूरश्विभ्यामुषसा सुवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत्.. (२) हे अग्नि! तुम देवताओं द्वारा सेवित दूत एवं हव्य वहन करने वाले हो. तुम यज्ञों के रथ हो. तुम अश्विनीकुमारों तथा उषा से मिलकर हमें शोभन एवं शक्तिसंपन्न पर्याप्त धन दो. (२) अद्या दूतं वृणीमहे वसुर्मग्निं पुरुप्रियम्. धूमकेतुं भ्राऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम्.. (३) हम देवताओं के दूत, निवास हेतु सबके प्रिय, धूम रूपी ध्वजा से युक्त, प्रसिद्ध प्रकाश से सुशोभित तथा प्रातःकाल यजमान के यज्ञ का सेवन करने वाले अग्नि को वरण करते हैं. (३) श्रेष्ठं यविष्ठमतिथिं स्वाहुतं जुष्टं जनाय दाशुषे. देवाँ अच्छा यातवे जातवेदसमग्निमीळे व्युष्टिषु.. (४) मैं उषाकाल में देव समूह के अभिमुख जाने के लिए श्रेष्ठ, अतिशय युवक, नित्य, चलने में सक्षम, सबके द्वारा बुलाए गए, हव्यदाता के प्रति प्रसन्न एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (४) स्तविष्यामि त्वामहं विश्वस्यामृत भोजन. अग्ने त्रातारममृतं मियेध्य यजिष्ठं हव्यवाहन.. (५) हे मरणरहित, विश्वरक्षक, हव्यवाहन एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! मैं तुम्हारी स्तुति करूंगा. (५) सुशंसो बोधि गृणते यविष्ठ्य मधुजिह्वः स्वाहुतः. प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम्.. (६) हे अतिशय युवक अग्नि! यजमान के लिए स्तुति करने वाले स्तोता के तुम्हीं स्तुति विषय हो. तुम्हारी जिह्वाएं सुख देने वाली हैं. भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम हमारा अभिप्राय समझो एवं आयु बढ़ा कर प्रस्कण्व को दीर्घजीवी बनाओ. वह देवभक्त है, तुम उसका सम्मान करो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*