भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 235

हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! आपके सामने रखा हुआ सोमरस अत्यंत मधुर एवं कल ही निचोड़ा गया है. इसे पान करो एवं हव्यदाता यजमान को रमणीय धन दो. (१) त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना. कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिविध बंधन काष्ठों वाले, तीनों लोकों में गमनशील एवं शोभन वर्ण वाले रथ से यहां आओ तथा कण्वपुत्रों द्वारा तुम्हारे लिए किए जा रहे स्तुति पाठ को आदरपूर्वक सुनो. (२) अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा. अथाद्य दस्रा वसु बिभ्रता रथे दाश्वांसमुप गच्छतम्.. (३) हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! अत्यंत मधुर सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम रथ में धन लेकर हविदाता यजमान के समीप आओ. (३) त्रिषधस्थे बर्हिषि विश्ववेदसा मध्वा यज्ञं मिमिक्षतम्. कण्वासो वां सुतसोमा अभिद्यवो युवां हवन्ते अश्विना.. (४) हे सर्वज्ञ अश्विनीकुमारो! तीन परतों के रूप में बिछे हुए कुशों पर बैठकर मधुर रस से इस यज्ञ को सिद्ध करने की इच्छा करो. दीप्तिसंपन्न कण्व पुत्र सोमरस निचोड़कर तुम्हें बुला रहे हैं. (४) याभिः कण्वमभिष्टिभिः प्रावतं युवमश्विना. ताभिः ष्व१स्माँ अवतं शुभस्पती पातं सोममृतावृधा .. (५) हे शोभनकर्मपालक अश्विनीकुमारो! जिस अभीष्ट रक्षण क्रिया से तुम दोनों ने कण्व की रक्षा की थी, उसी के द्वारा हमारी भी रक्षा करो. हे यज्ञवर्धक देवो! सोमपान करो. (५) सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना. रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम्.. (६) हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुम जिस प्रकार दानशील सुदास के लिए रथ में धन एवं अन्न भरकर लाए थे, उसी प्रकार हमें आकाश से लाकर बहुतों द्वारा वांछनीय धन दो. (६) यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे. अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः.. (७) हे नासत्यो! चाहे तुम दूर देश में रहो, चाहे अत्यंत समीप, पर सूर्योदय होने पर अपने शोभन रथ पर बैठकर सूर्यकिरणों के साथ हमारे समीप आओ. (७) ebook converter DEMO Watermarks*