ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे कण्वपुत्रो! अश्विनीकुमारों से यह पूछो कि आकाश से सूर्यकिरणें उत्पन्न होती हैं एवं वृष्टि के उत्पत्ति स्थल उसी आकाश से हमारे विकास का कारण उषाकालीन प्रकाश भी प्रकट होता है. हे अश्विनीकुमारो! इन दोनों स्थानों में से तुम अपना रूप कहां स्थापित करना चाहते हो? (९) अभूदु भा उ अंशवे हिरण्यं प्रति सूर्यः. व्यख्यज्जिह्वयासितः.. (१०) सूर्य के प्रकाश से उषाकाल में रश्मियां उत्पन्न हुई हैं. उदित हुआ सूर्य सोने के समान बन जाता है. आकाश में सूर्य के आ जाने के कारण अग्नि काले रंग की होकर अपनी लपटों से प्रकाशित है. (१०) अभूद् पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया. अदर्शि वि सुतिर्दिवः.. (११) रात्रि के पार उदयाचल तक जाने के लिए सूर्य का मार्ग सुंदर बना हुआ है. आकाश को प्रकाशित करने वाले सूर्य की दीप्ति दिखाई देती है. (११) तत्तदिदश्विनोरवो जरिता प्रति भूषति. मदे सोमस्य पिप्रतोः.. (१२) स्तोतागण प्रसन्नता के लिए सोमपान करने वाले अश्विनीकुमारों द्वारा की गई अपनी रक्षा की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१२) वावसाना विवस्वति सोमस्य पीत्या गिरा. मनुष्वच्छंभू आ गतम्.. (१३) हे सुखदाता अश्विनीकुमारो! तुम सोमपान और स्तुति श्रवण करने के लिए मनु के समान परिचारक यजमान के घर में निवास करो. (१३) युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत्. ऋता वनथो अक्तुभिः.. (१४) हे चारों ओर गमनशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे आगमन की शोभा का अनुसरण करती हुई उषा आवे. तुम दोनों निशा में संपादित यज्ञ का हवि ग्रहण करो. (१४) उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्. अविद्रियाभिरूतिभिः.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम अपनी प्रसिद्ध रक्षा द्वारा हमें सुखदान करो. (१५) सूक्त—४७ देवता—अश्विनीकुमार अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोम ऋतावृधा. तमश्विना पिबतं तिरोअह्नयं धत्तं रत्नानि दाशुषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*