ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंएषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः. स्तुषे वामश्विना बृहत्.. (१) यह प्रिय उषा मध्य रात्रि आदि पूर्व कालों में वर्तमान नहीं थी. यह इसी समय आकाश से आकर अंधकार मिटाती है. हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी बहुत स्तुति करता हूं. (१) या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम्. धिया देवा वसुविदा.. (२) मैं दर्शनीय एवं समुद्रपुत्र अश्विनीकुमारों की स्तुति करता हूं. वे शोभन संपत्ति देते हैं और यज्ञ करने पर हमें निवासस्थान प्रदान करते हैं. (२) वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि. यद्वां रथो विभिष्पतात्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम्हारा रथ विविध शास्त्रों द्वारा प्रशंसित स्वर्ग में घोड़ों द्वारा खींचा जाता है, उसी समय हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा. पिता कुटस्य चर्षणिः.. (४) हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! दयापूर्ण स्वभाव, पालक, यज्ञकर्म के दर्शक एवं अपने ताप से जल को सुखाने वाले सविता हमारे द्वारा हव्य से देवों को प्रसन्न करें. (४) आदारो वां मतीनां नासत्या मतवचसा. पातं सोमस्य धृष्णुया.. (५) हे स्तुति ग्रहण करने वाले नासत्यो! बुद्धिप्रेरक एवं तीव्र मदकारक सोमरस को पिओ. (५) या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासाथामिषम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! हमें इस वीर्य आदि ज्योति से युक्त अन्न दो. वह अन्न दरिद्रता रूपी अंधकार को मिटाकर तृप्ति प्रदान करता है. (६) आ नो नावा मतीनां यातं पाराय गन्तवे. युञ्जाथामश्विना रथम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों रूपी सागर के पार जाने के लिए तुम नौका बनकर आओ एवं धरती पर आने के लिए अपने रथ में घोड़े जोड़ो. (७) अरित्रं वां दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूनां रथः. धिया युयुज्र इन्दवः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! सागर तट पर स्थित तुम्हारी नौका आकाश से भी विशाल है. धरती पर गमन करने के लिए तुम्हारे पास रथ है. तुम्हारे यज्ञकर्म में सोमरस भी सम्मिलित रहता है. (८) दिवस्कण्वास इन्दवो वसु सिन्धूनां पदे. स्वं वव्रिं कुह धित्सथः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*