ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयाभिः कण्वस्य सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा.. (५) हे घृत द्वारा बुलाए गए एवं फलप्रद अग्नि! कण्व के पुत्र तुम्हें जिन वचनों से अपनी रक्षा के लिए बुलाते थे, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान उन्हीं वचनों को सुनो. (५) त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः. शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (६) हे विविध हविरूप अन्नयुक्त एवं यजमानों के प्रियकारक अग्नि! तुम्हारी चमकीली लपटें तुम्हारे केश हैं. यजमान तुम्हें हव्य-वहन करने के लिए बुलाते हैं. (६) नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम्. श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु.. (७) हे अग्नि देव! बुद्धिमान् लोग आह्वान करने वाले, ऋतुओं में यज्ञ संपन्न करने वाले, विविध धन प्राप्त कराने वाले, श्रवण समर्थ कानों से युक्त एवं अत्यंत प्रसिद्ध तुमको यज्ञों में धारण करते हैं. (७) आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुतसोमा अभि प्रयः. बृहद्भा बिभ्रतो हविरग्ने मर्ताय दाशुषे.. (८) हे अग्नि! सोमरस निचोड़ने वाले बुद्धिमान् ऋत्विज् हव्यदाता यजमान के लिए तुम्हें अन्न के समीप बुलाते हैं. तुम महान् एवं तेजस्वी हो. (८) प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य. इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो.. (९) हे काष्ठबल द्वारा मथित, फलदाता एवं निवास हेतु अग्नि! इस देवयज्ञ में आज प्रातःकाल आने वाले देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों को सोमपान के लिए कुशों पर बुलाओ. (९) अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः. अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरो अह्न्यम्.. (१०) हे अग्नि! अपने सामने उपस्थित देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों के समान आह्वानाें के द्वारा यजन करो. हे शोभन दान करने वाले देवो! जो सोमरस तुम्हारे निमित्त पिछले दिन निचोड़ा गया है, सामने उपस्थित उस सोमरस का पान करो. (१०) सूक्त—४६ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*