ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम्. हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय.. (११) हे सूर्य! तुम सबके अनुकूल प्रकाश से युक्त हो. तुम आज उदय होकर एवं ऊंचे आकाश में चढ़कर मेरा हृदय-रोग एवं हरिमाण नामक शरीर रोग नष्ट करो. (११) शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि. अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि.. (१२) मैं अपने हरिमाण नामक शारीरिक रोग को तोता और मैना नामक पक्षियों पर स्थापित करता हूं. मैं अपना हरिमाण रोग को हल्दी पर स्थापित करता हूं. (१२) उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह. द्विषन्तं मह्यं रन्धयन्मो अहं द्विषते रधम्.. (१३) ये सम्मुख वर्तमान सूर्य मेरे अनिष्टकारक रोग का विनाश करने के लिए संपूर्ण तेज के साथ उदय हुए हैं. मैं अपने अनिष्टकारी रोग का विनाशकर्त्ता नहीं हूं. (१३) सूक्त—५१ देवता—इंद्र अभि त्वं मेषं पुरुहूतमूग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम्. यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषा भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत.. (१) हे स्तोताओ! यजमानों द्वारा बुलाए गए, ऋत्विजों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, धन के आवास एवं बलवान् इंद्र को अपने वचनों द्वारा प्रसन्न करो. जो इंद्र सूर्यकिरणों के समान सबका हित करते हैं, उन्हीं अतिशय प्रबुद्ध एवं मेधावी इंद्र की भोग प्राप्ति के लिए अर्चना करो. (१) अभीमवन्वन्त्स्वभिष्टिमूतयोऽन्तरिक्षप्रां तविषीभिरावृतम्. इन्द्रं दक्षाय ऋभवो मदच्युतं शतक्रतुं जवनी सूनृतारुहत्.. (२) सबका रक्षण एवं प्रवर्धन करने वाले ऋभुगण नामक मरुतों ने शोभन, आगमनशील, अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अति बली, शत्रुओं का गर्व नष्ट करने वाले एवं शतक्रतु इंद्र के सम्मुख आकर उनकी सहायता की. (२) त्वं गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरपोतात्रये शतदुरेषु गातुवित्. ससेन चिच्छिद्रमादायावहो वस्वाजावद्रिं वावसानस्य नर्तयन्.. (३) हे इंद्र! तुमने अव्यक्त शब्द करने वाले एवं वर्षा के निरोधक मेघ को अपने वज्र से हटाकर अंगिरा ऋषियों के लिए जल बरसाया था. जब असुरों ने अत्रि को पीड़ा पहुंचाने के ebook converter DEMO Watermarks*