भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 244

इन्द्रो अश्रायि सुध्यो निरेके पज्रेषु स्तोमो दुर्यो न यूपः. अश्वयुर्गव्यू रथयुर्वस्यूरिन्द्र इद्रायः क्षयति प्रयन्ता.. (१४) शोभन कर्म वाले यजमान निर्धनता से सुरक्षित होने के लिए इंद्र की सेवा करते हैं. अंगिरावंशी यज्ञों के स्तोत्र यज्ञद्वार पर गड़े लकड़ी के खंभों के समान निश्चल हैं. धन देने वाले इंद्र यजमानों के लिए अश्व, रथ एवं विविध संपत्तियों को देने की इच्छा करते हैं तथा सब प्रकार के धन देने के लिए स्थित हैं. (१४) इदं नमो वृषभाय स्वराजे सत्यशुष्माय तवसेऽवाचि. अस्मिन्निन्द्र वृजने सर्ववीराः स्मत्सूरिभिस्तव शर्मन्त्स्याम.. (१५) हे इंद्र! तुम वर्णनशील, अपने तेज के द्वारा प्रकाशित, वास्तविक बलसंपन्न एवं अत्यंत महान् हो. हमने यह स्तुति वचन तुम्हारे लिए ही प्रयोग किया है. हम इस युद्ध में समस्त वीरों सहित विजय प्राप्त करके तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुंदर घर में विद्वान् ऋत्विजों के साथ निवास करें. (१५) सूक्त—५२ देवता—इंद्र त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभ्वः साकमीरते. अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथेमेन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१) हे अध्वर्युगणो! उन बली इंद्र की पूजा करो, जिनकी स्तुति सौ स्तोता एक साथ मिलकर करते हैं और जो स्वर्ग प्राप्त करा देते हैं. इंद्र का रथ तेज दौड़ते हुए घोड़े के समान अत्यंत वेगपूर्वक यज्ञ की ओर चलता है. मैं अपनी स्तुतियों के द्वारा इंद्र से अनुरोध करता हूं कि वे उसी रथ पर चढ़कर मेरी रक्षा करें. (१) स पर्वतो न धरुणेष्वच्युतः सहस्रमूतिस्तविषीषु वावृधे. इन्द्रो यद्वृत्रमवधीन्नदीवृतमुब्जन्नर्णोसि जर्हृषाणो अन्धसा.. (२) जिस समय यज्ञीय अन्न से प्रसन्न इंद्र ने जल की वर्षा करते हुए नदी के प्रवाह को रोकने वाले वृत्र का वध किया, उस समय वह धारा रूप में बहने वाले जल के बीच पर्वत के समान अचल रहा एवं उसने मनुष्यों की हजारों प्रकार से रक्षा करके पर्याप्त शक्ति प्राप्त की. (२) स हि द्वरो द्वरिषु व्व्र ऊधनि चन्द्रबुध्नो मदवृद्धो मनीषिभिः. इन्द्रं तमहे स्वपस्यया धिया मंहिष्ठरातिं स हि पप्रिरन्धसः.. (३) मैं विद्वान् ऋत्विजों के साथ आक्रमणकारी शत्रुओं को जीतने वाले, जल के समान आकाश में व्याप्त, सबकी प्रसन्नता के कारण, सोमपान से बुद्धिप्राप्त, महान् एवं धनसंपन्न इंद्र को अपनी शोभन कार्य योग्य बुद्धि से बुलाता हूं, क्योंकि वे इंद्र अन्न को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*