ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! तुम अपने उपभोग के लिए मेघ को भिन्न नहीं करते एवं विशाल धन के धारक कुबेरादि पर अधिकार जमाते हो. हम लोग इंद्र को उनकी शक्ति के कारण भली प्रकार जानते हैं. वे इंद्र अपने वृत्रवधादि रूप कार्यों के द्वारा सभी देवों में आगे का स्थान प्राप्त करते हैं. (३) स इद्धने नमस्युभिर्वचस्यते चारु जनेषु प्रब्रुवाण इन्द्रियम्. वृषा छन्दुर्भवति हर्यतो वृषा क्षेमेण धेनां मघवा यदिन्वति.. (४) स्तोता ऋषि अरण्य में इंद्र की स्तुति करते हैं. इंद्र अपने भक्तों में अपने शौर्य को प्रकट करते हुए शोभा पाते हैं. अभीष्ट वर्षा करने वाले इंद्र हव्यदाता यजमान की रक्षा करते हैं. जब यजमान यज्ञ की इच्छा से इंद्र की स्तुति करता है, तभी वे उसे यज्ञ में तत्पर कर देते हैं. (४) स इन्महानि समिथानि मज्मना कृणोति युध्म ओजसा जनेभ्यः. अधा चन श्रद्दधति त्विषीमत इन्द्राय वज्रं निघनिघ्नते वधम्.. (५) योद्धा इंद्र अपने भक्तों के कल्याण के लिए सबको शुद्ध करने वाले स्वकीय बल से महान् युद्ध करते हैं. इंद्र जिस समय हनन का साधन वज्र मेघों पर फेंकते हैं. उस समय सब लोग बलशाली कहकर तेजस्वी इंद्र के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं. (५) स हि श्रवस्युः सदनानि कृत्रिमा क्ष्मया वृधान ओजसा विनाश्यन्. ज्योतींषि कृण्वन्नवृकाणि यज्यवेऽव सुक्रतुः सर्तवा अपः सृजत्.. (६) शोभन कर्मों वाले इंद्र यश की कामना करते हुए असुरों के सुंदर बने हुए घरों को अपनी शक्ति से नष्ट कर देते हैं. वे धरती के समान विस्तृत हो जाते हैं एवं सूर्य आदि ज्योतिपिंडों को आवरणरहित करके यजमान के निमित्त बहने वाला जल बरसाते हैं. (६) दानाय मनः सोमपावन्न्रस्तु तेऽर्वाञ्चा हरी वन्दनश्रुदा कृधि. यमिष्ठासः सारथयो य इन्द्र ते न त्वा केता आ दभ्नुवन्ति भूर्णयः.. (७) हे सोमपायी इंद्र! तुम्हारा मन दान में लगा रहे. हे स्तुतिप्रिय इंद्र! तुम अपने हरि नामक घोड़ों को हमारे यज्ञ की ओर अभिमुख करो. हे इंद्र! तुम्हारे सारथि घोड़ों को वश में करने में अत्यंत कुशल हैं. इस कारण आयुध धारण करने वाले तुम्हारे शत्रु तुम्हें नहीं हरा सकते. (७) अप्रक्षितं वसु बिभर्षि हस्तयोरषाळ्हं सहस्तन्वि श्रुतो दधे. आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते क्रतव इन्द्र भूरयः.. (८) हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम अपने हाथों में क्षयरहित धन एवं शरीर में अपराजेय बल धारण करते हो. जिस प्रकार पानी भरने वाले लोग कुएं को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार वृत्रवधादि वीरतापूर्ण कर्म तुम्हारे शरीर को घेरे हुए हैं. हे इंद्र! इसीलिए तुम्हारे शरीर में अनेक कर्म विद्यमान हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*