ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—५६ देवता—इंद्र एष प्र पूर्वीरव तस्य चम्रिषोऽत्यो न योषामुदयंस्त भुर्वणिः. दक्षं महे पाययते हिरण्ययं रथमावृत्या हरियोगमृभ्वसम्.. (१) जिस प्रकार घोड़ा क्रीड़ा के निमित्त घोड़ी की ओर दौड़कर जाता है, उसी प्रकार पर्याप्त आहार करने वाले इंद्र यजमान द्वारा बहुत से पात्रों में रखे हुए सोमरस की ओर शीघ्रता से जाते हैं. वृत्रवधादि महान् कार्य में दक्ष वे इंद्र अपना स्वर्ण निर्मित, अश्वयुक्त एवं तेजस्वी रथ रोककर सोमरस पीते हैं. (१) तं गूर्तयो नेमन्निषः परीणसः समुद्रं न संचरणे सनिष्यवः. पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधि रोह तेजसा.. (२) जिस प्रकार धन चाहने वाले वणिक नावों में बैठकर आने-जाने के साधन समुद्र को व्याप्त किए रहते हैं, उसी प्रकार हाथों में हव्य लिए हुए स्तोता इंद्र को चारों ओर से घेरे रहते हैं. हे स्तोताओ! नारियां अपने मनपसंद फूल तोड़ने के लिए जिस प्रकार पर्वत पर चढ़ जाती हैं, उसी प्रकार तुम भी तेजस्वी स्तोत्र के सहारे विशाल यज्ञ के रक्षक एवं शक्तिशाली इंद्र के समीप पहुंच जाओ. (२) स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये गिरेर्भृष्टिर्न भ्राजते तुजा शवः. येन शुष्णं मायिनमासो मदे दुध्र आभूषु रामयन्नि दामनि.. (३) इंद्र शत्रुनाशक और महान् हैं. इंद्र की दोषरहित एवं शत्रुनाशकारी शक्ति वीर पुरुषों द्वारा करने योग्य संग्राम में पर्वत की चोटी के समान विराजमान होती है. शत्रुविनाशक एवं लौहकवचधारी इंद्र ने सोमपान के द्वारा मदोन्मत्त होकर मायावी असुर शुष्ण को बेड़ियां डाल कर कारागृह में बंद कर दिया था. (३) देवी यदि तविषी त्वावृधोतय इन्द्रं सिषक्त्युषसं न सूर्यः. यो धृष्णुना शवसा बाधते तम इयर्ति रेणुं बृहदर्हिरिष्वणिः.. (४) हे स्तोता! जिस प्रकार सूर्य नित्य उषा का सेवन करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी बल तुम्हारी रक्षा के निमित्त तुम्हारी स्तुतियां सुनकर वृद्धि प्राप्त करने वाले इंद्र की सेवा करता है. वे इंद्र, शत्रुनाशक शक्ति द्वारा अंधकार रूपी वृत्र असुर का नाश करते हैं एवं शत्रुओं को रुलाकर भली प्रकार नष्ट कर देते हैं. (४) वि यत्तिरो धरुणमच्युतं रजोऽतिष्ठिपो दिव आतासु बर्हणा. स्वर्मीळ्हे यन्मद इन्द्र हर्यश्वान्हन्वृत्रं निरपामौब्जो अर्णवम्.. (५) हे शत्रुहंता इंद्र! जिस समय तुमने वृत्र असुर द्वारा रोके हुए समस्त प्राणियों के