ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने स्वामी की अनेक प्रकार से स्तुति करता है, उसी प्रकार चतुर होता सुंदर गति वाले, वास्तविक शक्तिसंपन्न एवं सबके कुशल नेता वैश्वानर के लिए महान् एवं विविध स्तुतियों का प्रयोग करता है. (४) दिवश्चित्ते बृहतो जातवेदो वैश्वानर प्र रिरिचे महित्वम्. राजा कृष्टीनामसि मानुषीणां युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (५) हे जातवेद! तुम्हारा महत्त्व आकाश से भी बढ़कर है एवं तुम मानव प्रजाओं के राजा हो. तुमने असुरों द्वारा अपहृत धन युद्ध के द्वारा छीनकर देवों को दिया था. (५) प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूर्वो वृत्रहणं सचन्ते. वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वां अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत्.. (६) मनुष्य जलवर्षा के लिए जिस आवारक मेघ के हंता विद्युत्रूप अग्नि की सेवा करते हैं, मैं उसी जलवर्षी वैश्वानर के महत्त्व का उच्चारण करता हूं. उसने दस्यु को मारकर वर्षा का जल गिराया एवं शंबर का नाश किया. (६) वैश्वानरो महिम्ना विश्वकृष्टीर्भरद्वाजेषु यजतो विभावा. शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावन्.. (७) वैश्वानर अग्नि अपने महत्त्व के कारण समस्त मनुष्यों के स्वामी एवं पुष्टिवर्धक अन्न वाले यज्ञों में बुलाने योग्य हैं, शतवनि के पुत्र राजा पुरुणीथ अनेक यज्ञों में प्रकाशसंपन्न एवं प्रियवाक् अग्नि की स्तुति करते हैं. (७) सूक्त—६० देवता—अग्नि वह्निं यशसं विदथस्य केतुं सुप्राव्यं दूतं सद्यो अर्थम्. द्विजन्मानं रयिमिव प्रशस्तं रातिं भरद्भृगवे मातरिश्वा.. (१) मातरिश्वा हव्यवाहक, यशस्वी, यज्ञप्रकाशक, उत्तम रक्षक, देवों के दूत, हवि लेकर देवों के समीप जाने वाले, अरणिरूपी दो काष्ठों से उत्पन्न एवं धन के समान प्रशंसित अग्नि को भृगुवंशियों के मित्र के रूप में समीप लावें. (१) अस्य शासुरुभयासः सचन्ते हविष्मन्त उशिजो ये च मर्ताः. दिवश्चित्पूर्वो न्यसादि होतापृच्छ्यो विशपतिर्विक्षु वेधाः.. (२) हव्य के इच्छुक देव और हव्य धारण करने वाले यजमान दोनों ही शासक अग्नि की सेवा करते हैं, क्योंकि पूज्य, वांछितफलदाता एवं प्रजापति अग्नि सूर्योदय से भी पहले यजमानों के बीच स्थापित हुए हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*