भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 259

तं नव्यसी हृद आ जायमानमस्मत्सुकीर्तिमधुजिह्वमश्याः. यमृत्विजो वृजने मानुषासः प्रयस्वन्त आयवो जीजनन्त.. (३) हृदय में स्थित प्राण से उत्पन्न एवं मादक ज्वालाओं वाले अग्नि को हमारी नई स्तुतियां सामने से घेर लें. उचित समय पर यज्ञ करने वाले मनुष्यों ने संग्राम के समय अग्नि को उत्पन्न किया. (३) उशिक्पावको वसुर्मानुषेषु वरेण्यो होताधायि विक्षु. दमूना गृहपतिर्दम आँ अग्निर्भुवद्रयिपती रयीणाम्.. (४) यज्ञस्थल में प्रविष्ट यजमानों के बीच सबके प्रिय, शुद्धिकर्त्ता, निवास देने वाले, वरण करने योग्य अग्नि को स्थापित किया गया है. वे शत्रुदमन के लिए दृढ़निश्चयी, हमारे घरों के पालनकर्त्ता एवं यज्ञभवन में धन के अधिपति हों. (४) तं त्वा वयं पतिमग्ने रयीणां प्र शंसामो मतिभिर्गोतमासः. आशुं न वाजम्भरं मर्जयन्तः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (५) हे अग्नि! जिस प्रकार घोड़े पर चढ़ने का इच्छुक सवार घोड़े की पीठ साफ करता है, उसी प्रकार गौतम गोत्रोत्पन्न हम धन के स्वामी, सबके रक्षक, यज्ञ संबंधी अन्न के भर्ता तुझ अग्नि का मार्जन करते हुए सुंदर स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी सहायता करते हैं. हे बुद्धि द्वारा धन प्राप्त करने वाले अग्नि! कल प्रातःकाल शीघ्र आना. (५) सूक्त—६१ देवता—इंद्र अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय. ऋचीषमायाध्रिघव ओह्मिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा.. (१) जिस प्रकार भूखे को अन्न दिया जाता है, उसी प्रकार मैं शक्तिसंपन्न, शीघ्रता करने वाले, गुणों में महान्, स्तुति के अनुकूल व्यक्तित्व वाले एवं अबाधगति इंद्र को वरण करने योग्य स्तुतियां एवं पूर्ववर्ती यजमानों द्वारा अधिक मात्रा में दिया हुआ अन्न भेंट करता हूं. (१) अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्यङ्गूषं बाधे सुवृक्ति. इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये धियो मर्जयन्त.. (२) मैं इंद्र को अन्न के समान हव्य दान करता हूं तथा शत्रु को पराजित करने में समर्थ स्तुति वचनों का उच्चारण करता हूं. अन्य स्तुतिकर्त्ता भी उस प्राचीन स्वामी इंद्र के प्रति अंतःकरण, बुद्धि और ज्ञान की सहायता से स्तुतियां करते हैं. (२) अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षां भराम्याङ्गूषमास्येन. ebook converter DEMO Watermarks*

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