भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 1855 में से

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मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरि वावृधध्यै.. (३) मैं उन्हीं प्रसिद्ध, उपमान बने हुए, अत्यंत वरणीय, धन के दाता, विद्वान् इंद्र की वृद्धि के निमित्त समर्थ एवं स्वच्छ वचनों वाली स्तुति बोलता हुआ महान् शब्द करता हूं. (३) अस्मा इदु स्तोमं सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय. गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय.. (४) जिस प्रकार रथ बनाने वाला रथ के मालिक के पास रथ ले जाता है, उसी प्रकार मैं भी स्तुति योग्य इंद्र को लक्षित करके प्रशंसावचन प्रेषित करता हूं एवं बुद्धिसंपन्न इंद्र के लिए विश्वव्यापक हव्य का विसर्जन करता हूं. (४) अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा३समञ्जे. वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम्.. (५) जिस प्रकार अन्नलाभ के लिए जाने का इच्छुक व्यक्ति घोड़ों को रथ में जोड़ता है, उसी प्रकार मैं अन्नलाभ की अभिलाषा से स्तुतिरूपी मंत्र बोलता हूं. मैं उन्हीं वीर, दानपात्र, उत्तम अन्नयुक्त एवं असुरनगरों के विध्वंसकर्त्ता इंद्र की वंदना में लगा हुआ हूं. (५) अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं१ रणाय. वृत्रस्य चिद्दिदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः.. (६) त्वष्टा ने युद्ध के निमित्त इन इंद्र के लिए शोभन कर्म वाला एवं शत्रुओं के प्रति सरलता से फेंका जाने वाला वज्र बनाया था. शत्रुओं की हिंसा करते हुए ऐश्वर्य एवं बल से संपन्न इंद्र ने हनन करने वाले वज्र से वृत्र के मर्म का भेदन किया था. (६) अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाञ्चार्वन्ना. मुषायद्विष्णुः पचतं सहीयान्विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता.. (७) इंद्र ने जगत् निर्माण करने वाले इस महान् यज्ञ के तीन सवनों में सोमरूप अन्न का तुरंत पान किया है एवं हव्यरूप अन्न का भक्षण किया है. विश्वव्यापक, असुर धन के अपहर्ता, शत्रुविजयी एवं वज्र चलाने वाले इंद्र ने मेघ को पाकर विदीर्ण कर दिया. (७) अस्मा इदु ग्नाश्चिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कंमहिहत्य ऊवुः. परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः.. (८) जब इंद्र ने वृत्र का वध किया था, तब गमनशील देवपत्नियों ने उनकी स्तुति की थी. इंद्र अपने तेज के द्वारा आकाश और पृथ्वी से बढ़ गए थे, पर आकाश और धरती इंद्र की महिमा का अतिक्रमण नहीं कर सके. (८) ebook converter DEMO Watermarks*