ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुवानो रुद्रा अजरा अभोग्घनो ववक्षुरध्रिगावः पर्वता इव. दृळ्हा चिद्विश्वा भुवनानि पार्थिवा प्र च्यावयन्ति दिव्यानि मज्मना.. (३) युवक एवं जरारहित मरुद्गण देवताओं को हवि न देने वालों का नाश करते हैं. कोई उनकी गति रोक नहीं सकता, क्योंकि वे पर्वत के समान दृढ़ अंग वाले हैं एवं स्तोताओं की इच्छा पूरी करते हैं. वे धरती और आकाश की दृढ़ वस्तुओं को भी अपने बल से कंपित कर देते हैं. (३) चित्रैरञ्जिभिर्वपुषे व्यञ्जते वक्षःसु रुक्माँ अधि येतिरे शुभे. अंसेष्वेषां नि मिमृक्षुरृष्टयः साकं जज्ञिरे स्वधया दिवो नरः.. (४) मरुद्गण शोभा के लिए अपने शरीर को भांति-भांति के आभूषणों से विभूषित करते हैं एवं सीने पर सुंदर हार पहनते हैं. हाथों में आयुध धारण किए हुए नेतारूप मरुद्गण आकाश से अपनी शक्ति के साथ उत्पन्न हुए थे. (४) ईशानकृतो धुनयो रिशादसो वातान्विद्युतस्तविषीभिरक्रत. दुहन्त्यूर्धर्दिव्यानि धूतयो भूमिं पिन्वन्ति पयसा परिज्रयः.. (५) मरुतों ने स्तुतिकर्त्ताओं को सम्पत्तिशाली, मेघ आदि को कंपित एवं हिंसकों को समाप्त करके अपनी शक्ति से वायु, बिजली आदि को बनाया. इसके बाद चारों दिशाओं में जाने वाले एवं सबको कंपाने वाले मरुतों ने आकाश के मेघों को दुह कर निकले हुए जल से धरती को सींचा. (५) पिन्वन्त्यपो मरुतः सुदानवः पयो घृतवद्विदथेष्व्वाभुवः. अत्यं न मिहे वि नयन्ति वाजिनमुत्सं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितम्.. (६) ऋत्विज् जिस प्रकार घी से यज्ञभूमि को सींचते हैं, वैसे ही शोभन गति वाले मरुत् सारयुक्त जल से सारी धरती को सींचते हैं, क्योंकि घुड़सवार जिस प्रकार घोड़े को सिखाता है, उसी प्रकार वे वेगशाली मेघों को वर्षा के निमित्त अपने वश में कर लेते हैं एवं झुके हुए बादल को जलरहित बना देते हैं. (६) महिषासो मायिनश्चित्रभानवो गिरयो न स्वतवसो रघुष्यदः. मृगा इव हस्तिनः खादथा वना यदारुणीषु तविषीरयुग्ध्वम्.. (७) हे महान् मेधावी, तेजस्वी, पर्वत के समान शक्तिसंपन्न एवं शीघ्र गतिशील मरुद्गण! तुमने लाल रंग वाली बड़वा को शक्ति प्रदान की है, इसलिए तुम सूंड वाले हाथी के समान वृक्षसमूह को खाते हो. (७) सिंहा इव नानदति प्रचेतसः पिशाइव सुपिशो विश्ववेदसः. क्षपो जिन्वन्तः पृषतीभिर्ऋष्टिभिः समित्सबाधः शवसाहिमन्यवः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*