ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउच्च ज्ञान संपन्न मरुद्गण सिंह के समान गर्जन करते हैं, वे सर्वज्ञ हरिण के समान शोभन अंग वाले हैं. शत्रुनाशक, स्तोताओं को प्रसन्न करने वाले एवं नाशकारी क्रोधयुक्त बल से संपन्न मरुद्गण शत्रु द्वारा सताए हुए यजमान की रक्षा के निमित्त अपने वाहन हरिण एवं आयुधों सहित तुरंत आते हैं. (८) रोदसी आ वदता गणश्रियो नृषाचः शूराः शवसाहिमन्यवः. आ वन्धुरेष्वमतिर्न दर्शता विद्युन्न तस्थौ मरुतो रथेषु वः.. (९) हे मरुद्गण! तुम गण के रूप में स्थित, यजमान के हितसाधक एवं शौर्यसंपन्न हो. तुम बलशालियों को जब विनाशकारी क्रोध आ जाता है तो धरती और आकाश को गर्जन से भर देते हो. जिस प्रकार निर्मलरूप एवं मेघों में स्थित बिजली को सभी लोग देखते हैं, उसी प्रकार सारथिसहित रथ में बैठे हुए तुम सभी को दिखाई देते हो. (९) विश्ववेदसो रयिभिः समोकसः संमिश्वलासस्तविषीभिर्विरिप्शिनः. अस्तार इषुं दधिरे गभस्त्योरनंतशुष्मा वृषखादयो नरः.. (१०) सर्वज्ञ, संपत्तिशाली, शक्तिसंपन्न, महान्, शत्रुनाशक, सोमपायी एवं नेता मरुद्गण भुजाओं में आयुध धारण करते हैं. (१०) हिरण्ययेभिः पविभिः पयोवृध उज्जिघ्नन्त आपथ्यो३ न पर्वतान्. मखा अयासः स्वसृतो ध्रुवच्यतो दुध्रकृतो मरुतो भ्राजदृष्टयः.. (११) जिस प्रकार मार्ग में जाता हुआ रथ तिनकों को चूर्ण करके उड़ा देता है, उसी प्रकार वर्षा के जल का वर्षण करने वाले मरुद्गण अपने स्वर्ण निर्मित रथ के पहियों से मेघों को ऊपर उठा देते हैं. वे देवों की यज्ञभूमि में आने वाले, शत्रुओं की ओर अपने आप जाने वाले, निश्चल पर्वत आदि को चल बनाने वाले एवं चमकीले आयुधों वाले हैं. वे दुष्टों को वश में किए हैं. (११) घृषुं पावकं वनिनं विचर्षणिं रुद्रस्य सू नुं हवसा गृणीमसि. रजस्तुरं तवसं मारुतं गणमृजीषिणं वृषणं सश्चत श्रिये.. (१२) हम शत्रुबलनाशक, सबके पवित्रकर्त्ता, वर्षाकारक, सबके देखने वाले एवं रुद्रपुत्र मरुद्गण की स्तुति स्तोत्रों द्वारा करते हैं. हे यजमानो! तुम भी धनप्राप्ति के निमित्त धूल उड़ाने वाले, बल संपन्न ऋजीष नामक यज्ञ में आहूत तथा कामवर्षक मरुतों के समीप जाओ. (१२) प्र नू स मर्तः शवसा जनाँ अति तस्थौ व ऊती मरुतो यमावत. अर्वाद्भिर्वाजं भरते धना नृभिरापृच्छ्यं क्रतुमा क्षेति पुष्यति.. (१३) हे मरुद्गण! तुम्हारा आश्रय एवं रक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति सब मनुष्यों से अधिक ebook converter DEMO Watermarks*