ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलवान् बन जाता है, वह घोड़ों की सहायता से अन्न एवं अपने सेवकों की सहायता से धनलाभ करता है. वह शोभन यज्ञों का अनुष्ठानकर्त्ता एवं प्रजा, पुत्र आदि से संपन्न बनता है. (१३) चर्कृत्यं मरुतः पृत्सु दुष्टरं द्युमन्तं शुष्मं मघवत्सु धत्तन. धनस्पृतमुक्थ्यं विश्वचर्षणिं तोकं पुष्येम तनयं शतं हिमाः.. (१४) हे मरुद्गण! तुम हव्यदाता यजमानों को ऐसे पुत्र देते हो जो सभी कार्य करने में कुशल, संग्रामों में अजेय, तेजस्वी, शत्रुनाशक, धनसंपन्न, प्रशंसापात्र एवं सर्वज्ञ हों. हम इस प्रकार के पुत्र एवं पौत्रों को सौ वर्ष जीवित रखेंगे. (१४) नू ष्ठिरं मरुतो वीरवन्तमृतीषाहं रयिमस्मासु धत्त. सहस्रिणं शतिनं शूशुवांसं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१५) हे मरुद्गण! हमें स्थिर, शक्तिशाली एवं शत्रुजयी पुत्ररूपी धन दो. हमारे यज्ञकर्म से धन प्राप्त करने वाले, शक्तिशाली एवं शत्रुजयी पुत्ररूपी धन दो. हमारे यज्ञकर्म से धन प्राप्त करने वाले, मरुद्गण इस प्रकार के शतसहस्त्र पुत्ररूपी धन से युक्त हमारी रक्षा के लिए आवें. (१५) सूक्त—६५ देवता—अग्नि पश्वा न तायुं गुहा चतन्तं नमो युजानं नमो वहन्तम्. सजोषा धीराः पदैरनु ग्मन्नुप त्वा सीदन्विश्वे यजत्राः.. (१-२) जैसे पशु चुराने वाला पशुओं सहित गुफा में छिप जाता है और लोग उसके पैरों के चिह्न देखते हुए उसके पास तक पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार मेधावी एवं समान मति देवगण तुम्हारे चरणचिह्नों के सहारे तुम तक पहुंच गए. यज्ञपात्र समस्त देवगण तुम्हारे समीप आए थे, अतः तुम स्वयं हव्य का भक्षण करो और अन्य देवों के लिए भी ले जाओ. (१-२) ऋतस्य देवा अनु व्रता गुर्भुवत्परिष्टिर्द्यौर्न भूम. वर्धन्तीमापः पन्वा सुशिश्विमृतस्य योना गर्भे सुजातम्.. (३-४) देवों ने भागे हुए अग्नि के कर्मों की खोज की थी. यह खोज चारों दिशाओं में की गई. अग्नि को खोजने के लिए इंद्र आदि देव धरती पर आए थे, इसलिए धरती स्वर्ग के तुल्य बन गई थी. यज्ञ के कारणभूत, जल के गर्भ से उत्पन्न एवं ऋत्विजों की स्तुतियों द्वारा प्रबुद्ध अग्नि को छिपाने के लिए जल में वृद्धि हुई थी. (३-४) पुष्टिर्न रण्वा क्षितिर्न पृथ्वी गिरिर्न भुज्म क्षोदो न शंभु. अत्यो नाज्मन्त्सर्गप्रतक्तः सिन्धुर्न क्षोदः क ईं वराते.. (५-६) ebook converter DEMO Watermarks*