भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 274

नकिष्ट एता व्रता मिनन्ति नृभ्यो यदेभ्यः श्रुष्टिं चकर्थ. तत्तु ते दंसो यदहन्त्समानैर्नृभिर्यद्युक्तो विवे रपांसि.. (७-८) हे अग्नि! राक्षसादि बाधक तुमसे संबंधित यज्ञों का विनाश नहीं कर पाते, क्योंकि उन कर्मों में संलग्न यजमानों को तुम फल के रूप में सुख प्रदान करते हो. यदि तुम्हारे कर्म को राक्षसादि नष्ट करते हैं तो तुम अपने साथी नेता मरुद्गण को लेकर उन्हें भगा देते हो. (७-८) उषो न जारो विभावोस्रः संजातरूपश्चिकेतदस्मै. त्मना वहन्तो दुरो व्यृण्वन्नवन्त विश्वे स्वर् दृशीके.. (९-१०) उषा के जार सूर्य के समान प्रकाशयुक्त, निवास योग्य एवं विश्वविदित स्वरूप वाले अग्नि यजमान को जानें. अग्नि की किरणें स्वयं ही हव्य वहन करती हुई एवं यज्ञगृह के द्वार को व्याप्त करती हुई दर्शनीय आकाश में फैलती हैं. (९-१०) सूक्त—७० देवता—अग्नि वनेम पूर्वीर्यो मनीषा अग्निः सुशोको विश्वान्यश्याः. आ दैव्यानि व्रता चिकित्वाना मानुषस्य जनस्य जन्म.. (१-२) बुद्धि द्वारा प्राप्तव्य, शोभनदीप्ति संपन्न, देवों के व्रत एवं मानवों के जन्मरूप कर्म समझकर सारे कार्यों में व्याप्त अन्न की याचना करते हैं. (१-२) गर्भो यो अपां गर्भो वनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम्. अद्रौ चिदस्मा अन्तर्हुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः.. (३-४) जो अग्नि जल, अरण्य, स्थावर एवं जंगमों के गर्भ में स्थित रहते हैं, उन्हें लोग यज्ञमंडप एवं पर्वत के ऊपर हवि देते हैं. प्रजाओं के सुख का इच्छुक राजा जिस प्रकार उनकी रक्षा करता है, उसी प्रकार मरणरहित अग्नि हमारे प्रति शोभन कर्म करें. (३-४) स हि क्षपावाँ अग्नी रयीणां दाशद्यो अस्मा अरं सूक्तैः. एता चिकित्वो भूमा नि पाहि देवानां जन्म मर्ताँश्च विद्वान्.. (५-६) जो यजमान मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति करता है, रात्रि के स्वामी अग्नि उसे धन देते हैं. हे सर्वज्ञ अग्नि! तुम देवों एवं मानवों के जन्म के विषय में जानते हुए प्राणिसमूह का पालन करो. (५-६) वर्धान्यं पूर्वीः क्षपो विरूपाः स्थातुश्च रथमृतप्रवीतम्. अराधि होता स्व१र्निषत्तः कृण्वन्विश्वान्यपांसि सत्या.. (७-८) उषा और रात्रि का रूप भिन्न है, फिर भी वे अग्नि की वृद्धि करती हैं. इसी प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*