भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

स्थावर एवं जंगम अमृतरूप उदक घिरी हुई अग्नि को बढ़ाते हैं. देवयज्ञ में स्थित होकर देवों को बुलाने वाले अग्नि समस्त यज्ञकर्मों को सत्यफल देते हुए आराधित हों. (७-८) गोषु प्रशस्तिं वनेषु धिषे भरन्त विश्वे बलिं स्वर्णः. वि त्वा नरः पुरुत्रा सपर्य्यन्पितुर्न जिब्रेर्वि वेदो भरन्त.. (९-१०) हे अग्नि! हमारे काम आने वाले गाय आदि पशुओं को प्रशंसनीय बनाओ. समस्त मनुष्य हमारे लिए भेंट के रूप में धन लावें. जिस प्रकार वृद्ध पिता से पुत्र धन पाता है, उसी प्रकार यजमान अनेक देवयज्ञों के स्थलों में तुम्हारी भांति-भांति से सेवा करते एवं धनलाभ करते हैं. (९-१०) साधुर्न गृध्नुरस्तेव शूरो यातेव भीमस्त्वेषः समत्सु.. (११) अग्नि साधक के समान समस्त हव्य स्वीकार करते हैं. वे धानुष्क के समान शूर, शत्रु के समान भयंकर एवं संग्रामों में दीप्त होकर हमारी सहायता करें. (११) सूक्त—७१ देवता—अग्नि उप प्र जिन्वन्नुशतीरुशन्तं पतिं न नित्यं जनयः सनीळाः. स्वसारः श्यावीमरुषीमजुषञ्चित्रमुच्छन्तीमुषसं न गावः.. (१) कामना करने वाली एवं एक साथ निवास करने वाली उंगलियां हव्य की अभिलाषा करने वाले अग्नि को हव्य देकर उसी प्रकार प्रसन्न करती हैं, जिस प्रकार विवाहिता नारी अपने पति को प्रसन्न करती है. पहले कृष्णवर्ण धारण करने वाली उषा की सेवा जिस प्रकार सूर्यकिरणें करती हैं, उसी प्रकार उंगलियां पूजनीय अग्नि की अंजलिबंधन से सेवा करती हैं. (१) वीळु चिद्द्दूळ्हा पितरो न उक्थैरद्रिं रुजन्नङ्गिरसो रवेण. चक्रुर्दिवो बृहतो गातुमस्मे अहः स्वर्विदुः केतुमुस्राः.. (२) हमारे पितर अंगिराओं ने मंत्र द्वारा अग्नि की स्तुति करके उस स्तुति शब्द द्वारा ही बलवान् एवं दृढ़ पणि असुर को समाप्त किया था एवं हमारे लिए महान् द्युलोक का मार्ग बनाया था. इसके पश्चात् उन्होंने सुखपूर्वक प्राप्य दिवस, संसार प्रकाशक सूर्य एवं पणियों द्वारा चुराई गई गायों को जाना था. (२) दधन्नृतं धनयन्नस्य धीतिमादिदर्यो दिधिष्वो३ विभृत्राः. अतृष्यन्तीरपसो यन्त्यच्छा देवाञ्जन्म प्रयसा वर्धयन्तीः.. (३) जिस प्रकार लोग धन धारण करते हैं, उसी प्रकार अंगिरावंशी ऋषियों ने यज्ञ की अग्नि eBook converter DEMO Watermarks*

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 275, कुल 1855 में से · BharatKosha