ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको धारण किया था. जो यजमान धन के स्वामी हैं जो अन्य विषयों की तृष्णा से रहित होकर अग्नि को धारण करते हुए यज्ञकर्म में संलग्न रहते हैं, वे हविरूप अन्न के द्वारा देवों और मानवों की वृद्धि करते हुए अग्नि के सम्मुख जाते हैं. (३) मथीद्यदीं विभृतो मातरिश्वा गृहेगृहे श्येतो जेन्यो भूत्. आदीं राज्ञे न सहीयसे सचा सन्ना दूत्यं१ भृगवाणो विवाय.. (४) व्यान रूपी वायु अग्नि को जब-जब मथते हैं, तब-तब यह शुभ्र वर्ण अग्नि समस्त यज्ञगृह में उत्पन्न होते हैं. जिस प्रकार मित्रता का आचरण करता हुआ राजा बली राजा के समीप अपना दूत भेजता है, उसी प्रकार भृगु ऋषि ने अग्नि को दूत के काम में लगाया. (४) महे यत्पित्र ईं रसं दिवे करव त्सरत्पृशन्यश्चिकित्वान्. सृजदस्ता धृषता दिद्युमस्मै स्वायां देवो दुहितरि त्विषिं धात्.. (५) हे अग्नि! जब यजमान महान् एवं पालनकर्त्ता देवगण के लिए धरती का सारभूत रस देता है, तब स्पर्श करने में कुशल राक्षस आदि तुम्हें हव्यवाहक जानकर पलायन कर जाते हैं. बाण फेंकने में कुशल अग्नि अपने शत्रुनाशक धनुष से उन भागते हुए राक्षसों आदि पर प्रकाशयुक्त बाण फेंकते हैं एवं अपनी पुत्री उषा में दीप्तिमान् अग्नि देव अपना तेज स्थापित करते हैं. (५) स्व आ यस्तुभ्यं दम आ विभाति नमो वा दाशादुशतो अनु द्यून्. वर्धो अग्ने वयो अस्य द्विबर्हा यासद्राया सरथं यं जुनासि.. (६) हे द्विबर्हा अग्नि देव! जो यजमान तुम्हें अपने यज्ञगृह में शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार काष्ठों से चारों ओर प्रज्वलित करता है एवं कामना करने वाले तुम्हारे लिए प्रतिदिन नमस्कार करता है, तुम उसके अन्न की वृद्धि करते हो. जो व्यक्ति रथसहित युद्धाभिलाषी पुरुष को रण में प्रेरित करता है, वह पुरुष धन प्राप्त करता है. (६) अग्निं विश्वा अभि पृक्षः सचन्ते समुद्रं न स्रवतः सप्त यह्वीः. न जामिभिर्वि चिकिते वयो नो विदा देवेषु प्रमतिं चिकित्वान्.. (७) जिस प्रकार विशाल सात सरिताएं सागर के पास पहुंचती हैं, उसी प्रकार समस्त हव्य अन्न अग्नि को प्राप्त होते हैं. हमारे पास इतना कम अन्न है कि हमारी जाति वाले उसका भाग नहीं पाते. इसलिए तुम देवों में मननीय धन को जानकर हमें प्राप्त कराओ. (७) आ यदिषे नृपतिं तेज आनट् छुचि रेतो निषिक्तं द्यौरभीके. अग्निः शर्धमनवद्यं युवानं स्वाध्यं जनयत्सूदयच्च.. (८) अग्नि का शुद्ध एवं दीप्त तेज अन्न के लिए जठराग्नि के रूप में यजमान को व्याप्त कर ले. उसी तेज द्वारा परिपक्व वीर्य गर्भस्थान में पहुंचकर पुत्र उत्पन्न करे तथा उसे शुभ कर्म में ebook converter DEMO Watermarks*