ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको वा यज्ञैः परि दक्षं त आप केन वा ते मनसा दाशेम.. (१) हे अग्नि! हमारे प्रति तुम्हारा मन प्रसन्न होने का क्या उपाय है? तुम्हें सुख देने वाली स्तुति कैसी होगी? तुम्हारी क्षमता के अनुकूल यज्ञ कौन यजमान कर सकता है? हम किस मन से तुम्हें हव्य प्रदान करें? (१) एह्यग्न इह होता नि षीदादब्धः सु पुरएता भवा नः. अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजा महे सौमनसाय देवान्.. (२) हे अग्नि! इस यज्ञ में आओ और देवों के आह्वानकर्त्ता बनकर बैठो. राक्षसादि तुम्हारी हिंसा नहीं कर सकते, इसलिए तुम हमारे अग्रगामी नेता बनो. तुम समस्त आकाश एवं धरती द्वारा रक्षित होकर देवों को परम प्रसन्न करने के लिए हवि द्वारा उनकी पूजा करो. (२) प्र सु विश्वान्रक्षसो धक्ष्यग्ने भवा यज्ञानामभिशस्तिपावा. अथा वह सोमपतिं हरिभ्यामातिथ्यमस्मै चकृमा सुदाव्ने.. (३) हे अग्नि! समस्त राक्षसों को भली प्रकार नष्ट करके हिंसा से यज्ञ की रक्षा करो. संपूर्ण सोमरसों के पालनकर्त्ता इंद्र को उसके हरि नामक अश्वों सहित इस यज्ञ में लाओ, क्योंकि हम शोभन फलदाता इंद्र का अतिथि सत्कार करेंगे. (३) प्रजावता वचसा वह्निरासा च हुवे नि च सत्सीह देवैः. वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूनाम्.. (४) मैं मुख द्वारा हव्य ग्रहण करने वाले अग्नि का आह्वान ऐसे स्तोत्रों द्वारा करता हूं जो संतान आदि फल देने में समर्थ हैं. हे यज्ञकर्म योग्य अग्नि! तुम अन्य देवों के साथ बैठो एवं होता तथा पोता द्वारा किए जाने वाले कर्म करो. तुम धन के स्वामी एवं सबके जन्मदाता बनकर हमें जगाओ. (४) यथा विप्रस्य मनुषो हविर्भिर्देवाँ अयजः कविभिः कविः सन्. एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्वा यजस्व.. (५) हे अग्नि! तुमने क्रांतदर्शी बनकर मेधावी ऋत्विजों के साथ जिस प्रकार मेधावी मनु के यज्ञ में हव्य द्वारा देवों की पूजा की थी, हे यज्ञ संपन्नकर्त्ता साधु अग्नि! इसी प्रकार तुम इस यज्ञ में देवों की पूजा आनंददायक जुहू नामक स्रुक् द्वारा करो. (५) सूक्त—७७ देवता—अग्नि कथा दाशेमाग्नये कास्मै देवजुष्टोच्यते भामिने गीः. यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा होता यजिष्ठ इत्कृणोति देवान्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*