भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 284

मरणरहित, सत्ययुक्त, देवों का आह्वान करने वाले, यज्ञ पूर्ण कराने वाले एवं मनुष्यों के बीच निवास करके भी देवों को हवियुक्त करने वाले अग्नि के अनुरूप हव्य हम कैसे दे सकेंगे? हम तेजस्वी अग्नि के प्रति देवोचित स्तुति किस प्रकार करेंगे. (१) यो अध्वरेषु शंतम ऋतावा होता तमू नमोभिरा कृणुध्वम्. अग्निर्यद्देर्मर्त्ताय देवान्त्स चा बोधाति मनसा यजाति.. (२) हे यजमानो! जो अग्नि यज्ञों में अतिशय सुखकारी, यथार्थदर्शी और देवों का आह्वान करने वाले हैं, उन्हें स्तुतियों द्वारा हमारे अभिमुख करो. जिस समय अग्नि यजमान के निमित्त देवों के समीप जाते हैं, उस समय वे देवों को यज्ञपात्र जानकर मन से उनकी पूजा करते हैं. (२) स हि क्रतुः स मर्यः स साधुर्मित्रो न भूदद्भुतस्य रथीः. तं मेधेषु प्रथमं देवयन्तीर्विश उप ब्रुवते दस्ममारीः.. (३) देवों की अभिलाषा करने वाली प्रजाएं यज्ञकर्त्ता, विश्वसंहारक, उत्पादनकर्त्ता, मित्र के समान अप्राप्त धन के प्राप्त कराने वाले एवं दर्शनीय अग्नि के समीप जाकर उन्हें यज्ञ का प्रधान देव मानतीं एवं उनकी स्तुति करती हैं. (३) स नो नॄणां नृतमो रिशादा अग्निर्गिरोऽवसा वेतु धीतिम्. तना च ये मघवानः शविष्ठा वाजप्रसूता इषयन्त मन्म.. (४) यज्ञ के नेताओं के मध्य अतिशय नेता एवं शत्रुओं के भक्षणकर्त्ता अग्नि हमारी स्तुतियों एवं हव्य से युक्त यज्ञ की कामना करें. जो धनी और शक्तिशाली यजमान हव्य प्रदान करके अग्नि के मननीय स्तोत्र को करना चाहते हैं, अग्नि भी उनकी स्तुति की कामना करें. (४) एवाग्निर्गोतमेभिर्ऋतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः. स एषु द्युम्नं पीपयत्स वाजं स पुष्टिं याति जोषमा चिकित्वान्.. (५) यज्ञ के स्वामी एवं सर्वज्ञाता अग्नि की गौतम आदि ऋषियों ने इसी प्रकार स्तुति की थी. अग्नि ने प्रसन्न होकर उन ऋषियों का तेजस्वी सोम पिया था एवं अन्न भक्षण किया था. वे अग्नि हमारे द्वारा दिए हव्य को जानकर पुष्ट होते हैं. (५) सूक्त—७८ देवता—अग्नि अभि त्वा गोतमा गिरा जातवेदो विचर्षणे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (१) हे जातवेद एवं सर्वदर्शक अग्नि! गौतम ऋषि ने तुम्हारी स्तुति की थी. हम भी तुम्हारे गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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