ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (२) धन की इच्छा वाले गौतम ऋषि जिस अग्नि की स्तोत्र द्वारा सेवा करते हैं, हम भी गुणप्रकाशक स्तोत्र द्वारा उसी अग्नि की बार-बार स्तुति करते हैं. (२) तमु त्वा वाजसातममङ्गिरस्वद्धवामहे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (३) हे अग्नि! हम अंगिरा ऋषि के समान सर्वाधिक अन्न देने वाले तुम्हें बुलाते हैं एवं तुम्हारे गुणप्रकाशक मंत्रों से बार-बार स्तुति करते हैं. (३) तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूंरवधूनुषे. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (४) हे अग्नि! तुम दस्युओं एवं अनार्यों को स्थानच्युत करो. हम सर्वापेक्षा शत्रुहंता तुम्हारी स्तुति तुम्हारे गुण प्रकाशक मंत्रों से बार-बार करते हैं. (४) अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वचः. द्युम्नैरभि प्र णोनुमः.. (५) मैं रहूगणवंशीय गौतम अग्नि के प्रति मधुरवचनों का प्रयोग करता हुआ गुणप्रकाशक स्तोत्र द्वारा उनकी बार-बार स्तुति करता हूं. (५) सूक्त—७९ देवता—अग्नि हिरण्यकेशो रजसो विसारेऽहिर्धुनिर्वात इव ध्रजीमान्. शुचिभ्राजा उषसो नवेदा यशस्वतीरपस्युवो न सत्याः.. (१) हिरण्यकेश विद्युतरूप अग्नि मेघों को कंपित करने वाले, वायु के समान शीघ्रगतियुक्त एवं शोभनदीप्ति वाले बनकर मेघ से जल बरसाना जानते हैं, अन्नयुक्त, अपने काम में लगी हुई एवं सीधीसादी प्रजाओं के समान उषा यह कार्य नहीं जानती. (१) आ ते सुपर्णा अमिनन्तँ एवैः कृष्णो नोनाव वृषभो यदीदम्. शिवाभिर्न स्मयमानाभिरागात्पतन्ति मिहः स्तनयन्त्यभ्रा.. (२) हे अग्नि! तुम्हारी शोभन पतनशील किरणें मरुतों के साथ मिलकर वर्षा के उद्देश्य से मेघों को ताड़ित करती हैं. तभी कृष्ण वर्ण एवं वर्षाकारी मेघ गरजता है और सुखकारिणी तथा हंसती हुई सी श्वेत बूंदों के साथ आता है, फिर पानी गिरता है और बादल गरजता है. (२) यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृतस्य पथिभी रजिष्ठैः. अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा त्वचं पृञ्चन्त्युपरस्य योनौ.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*