भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 286

जब ये अग्नि उदक के रस से संसार को भिगोते हैं एवं स्नान, पान आदि के रूप में जल के उपयोग का सरल उपाय बताते हैं, उस समय अर्यमा, मित्र, वरुण एवं चारों ओर गतिशील मरुद्गण मेघ के जलोत्पत्ति स्थान के आच्छादन को नष्ट करते हैं. (३) अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो. अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः.. (४) हे शक्तिपुत्र अग्नि! तुम बहुसंख्यक गायों से युक्त अन्न के स्वामी हो. हे जातवेद! हमें पर्याप्त अन्न दो. (४) स इधानो वसुष्कविरग्निरीळेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (५) हे दीपनशील, सबको निवास देने वाले, क्रांतदर्शी, स्तोत्र द्वारा प्रशंसनीय एवं अनेक ज्वाला युक्त अग्नि! तुम इस प्रकार दीप्त बनो, जिस प्रकार हमारे पास धनयुक्त अन्न हो सके. (५) क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (६) हे तेजस्वी अग्नि! दिवस अथवा रात्रि में अपने आप या अपने पुरुषों द्वारा राक्षस आदि को बाधित करो. हे तीक्ष्णमुख! प्रत्येक राक्षस को जलाओ. (६) अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि. विश्वासु धीषु वन्द्य.. (७) हे समस्त यज्ञकर्मों में वंदनीय अग्नि! हमारे गायत्री छंद वाले सूक्त के संपादन के कारण प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करो. (७) आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यं. विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्.. (८) हे अग्नि! हमें दारिद्र्य का अविलंब विनाश करने वाला, वरणीय एवं समस्त संग्रामों में शत्रुओं द्वारा दुस्तर धन दो. (८) आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्. मार्डीकं धेहि जीवसे.. (९) हे अग्नि! हमारे जीवन के लिए शोभन ज्ञानयुक्त, सुखहेतु, संपूर्ण आयु पर्यंत देह आदि का पोषक धन प्रदान करो. (९) प्र पूतास्तिग्मशोचिषे वाचो गोतमाग्नये. भरस्व सुम्नयुर्गिरः.. (१०) हे शोभन धन के अभिलाषी गौतम! विशुद्ध वचनों से तीक्ष्ण ज्वालाओं वाले अग्नि की स्तुति करो. (१०) यो नो अग्नेऽभिदासत्यन्ति दूरे पदीष्ट सः. अस्माकमिद्वृधे भव.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*