ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे अग्नि! जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमें हानि पहुंचाता है, उसे नष्ट करके हमारी वृद्धि करो. (११) सहस्राक्षो विचर्षणििरग्नी रक्षांसि सेधति. होता गृणीत उक्थ्यः.. (१२) असंख्य ज्वालाओं वाले एवं सबको विशेष रूप से देखने वाले अग्नि राक्षसों को यज्ञभूमि से भगाते हैं, वे हमारे द्वारा स्तोत्रों की सहायता से स्तुत होकर देवों को बुलाते एवं उनकी स्तुति करते हैं. (१२) सूक्त-८० देवता—इंद्र इत्था हि सोम इन्मदे ब्रह्मा चकार वर्धनम्. शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१) हे अतिशय शक्तिशाली एवं वज्रधारी इंद्र! जब तुमने प्रसन्नतादायक सोमरस पी लिया तो स्तोता ने तुम्हारी वृद्धि करने वाली स्तुतियां कीं इसीलिए तुमने अपनी शक्ति से धरती पर खड़े होकर अहि नामक राक्षस को पीटते हुए अपना अधिकार प्रकट किया था. (१) स त्वामदद्वृषा मदः सोमः श्येनाभृतः सुतः. येना वृत्रं निरद्भ्यो जघन्थ वज्रिन्नोजसार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (२) हे इंद्र! गीले करने वाले मादक श्येन पक्षी का रूप धारण करने वाली गायत्री द्वारा लाए गए एवं निचोड़े हुए सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. हे वज्री! तुमने अपना अधिकार प्रकट करते हुए अपनी शक्ति से आकाश में वृत्र राक्षस को मारा था. (२) प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते. इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (३) हे इंद्र! जाओ और शत्रुओं के सामने पहुंचकर उन्हें हराओ कोई भी न तो तुम्हारे वज्र का नियमन कर सकता है और न तुम्हारी शक्ति को अभिभूत करने में समर्थ है, इसलिए तुम वृत्र राक्षस का वध करके उसके द्वारा रोके हुए जल को प्राप्त करो एवं अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन करो. (३) निरिन्द्र भूम्या अधिं वृत्रं जघन्थ निर्दिवः. सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (४) हे इंद्र! तुमने धरती और आकाश के ऊपर वृत्र का वध किया था तथा अपना प्रभुत्व स्पष्ट करते हुए मरुद्गणों से युक्त एवं जीवों को तृप्त करने वाला जल बरसाया था. (४) इन्द्रो वृत्रस्य दोधतः सानुं वज्रेण हीळितः. ebook converter DEMO Watermarks*