भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 289

यदिन्द्र वज्रिन्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (११) हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारे क्रोध से ये विशाल धरती-आकाश भयभीत होकर कांपते हैं, क्योंकि तुमने मरुतों के साथ मिलकर अपनी शक्ति से वृत्र का वध किया एवं अपना अधिकार प्रदर्शित किया. (११) न वेपसा न तन्यतेन्द्रं वृत्रो वि बीभयत्. अभ्येनं वज्र आयसः सहस्रभृष्टिरायतार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१२) वृत्र अपने कंपन से इंद्र को नहीं डरा पाया. इंद्र द्वारा छोड़ा हुआ लौह निर्मित एवं हजार धारों वाला वज्र वृत्र को मारने के लिए उसकी ओर गया. इस प्रकार इंद्र ने अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया. (१२) यदवृत्रं तव चाशनिं वज्रेण समयोधयः. अहिमिन्द्र जिघांसतो दिवि ते बद्धे शवोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१३) हे इंद्र! जब वृत्र ने तुम्हें मारने के लिए अशनि छोड़ी और तुमने उसे अपने वज्र से नष्ट कर दिया, उस समय तुमने अहि अर्थात् वृत्र के नाश के लिए संकल्प किया और तुम्हारा बल आकाश में व्याप्त हो गया. इस प्रकार तुमने अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया. (१३) अभिष्टने ते अद्रिवो यत्स्था जगच्च रेजते. त्वष्टा चित्तव मन्यव इन्द्र वेविज्यते भियार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१४) हे वज्रधारी इंद्र! जब तुम सिंहनाद करते हो तो स्थावर और जंगम सभी कांप उठते हैं तथा वज्रनिर्माता त्वष्टा भी तुम्हारे कोप से भयभीत हो उठते हैं. इस प्रकार तुम अपना अधिकार दिखाते हो. (१४) नहि नु यादथीमसीन्द्रं को वीर्या परः. तस्मिन्नृम्णमुत क्रतुं देवा ओजांसि सं दधुरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१५) सर्वत्र व्यापक इंद्र को हम नहीं जान सकते, क्योंकि अत्यंत दूर अवस्थित इंद्र की सामर्थ्य को कौन जान सकता है? देवों ने इंद्र में अपना धन, क्रतु एवं बल स्थापित किया था, इसलिए इंद्र ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया. (१५) यामथर्वा मनुष्पिता दध्यङ्धियमत्नत. तस्मिन्ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम्.. (१६) अथर्वा ऋषि, समस्त प्रजाओं के पिता तुल्य मनु एवं अथर्वा के पुत्र दध्यंग ऋषि ने जितने भी यज्ञकर्म किए, उन में प्रयुक्त हवि रूप अन्न एवं स्तोत्र प्राचीन ऋषियों के यज्ञों के समान इंद्र को ही मिले. इसलिए इंद्र ने अपने अधिकार का प्रदर्शन किया. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*