ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—८१ देवता—इंद्र इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः. तमिन्महत्स्वाजिषूतेमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत्.. (१) वृत्रहंता इंद्र ऋत्विजों की स्तुति द्वारा बल और हर्ष पाने के लिए बढ़ें. हम उन्हें बड़े और छोटे युद्धों में बुलाते हैं. वे युद्ध में हमारी रक्षा करें. (१) असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः. असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु.. (२) हे वीर इंद्र! तुम अकेले होने पर भी सेना के समान हो. तुम शत्रुओं के विपुल धन को छीन लेते हो एवं अपने अल्प स्तुतिकर्त्ता को भी बढ़ाते हो. तुम यज्ञ करने वाले सोमरसदाता को अपेक्षित धन देते हो, क्योंकि तुम्हारे पास बहुत धन है. (२) यदुदीरत आजयो धृष्णवे धीयते धना. युक्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसो दधोऽस्माँ इन्द्र वसौ दधः.. (३) युद्ध आरंभ होने पर विजेता अपने हारे हुए शत्रुओं का धन प्राप्त करता है. हे इंद्र! अपने रथ में शत्रुओं का गर्व मिटाने वाले घोड़े जोड़ो. तुम अपनी सेवा से विमुख राजा को मारते तथा सेवापरायण को दान देते हो, इसलिए हमें धन दो. (३) क्रत्वा महाँ अनुष्वधं भीम आ वावृधे शवः. श्रिय ऋष्व उपाकयोर्नि शिप्री हरिवान्दधे हस्तयोर्वज्रमायसम्.. (४) यज्ञकर्म द्वारा महान् एवं शत्रुओं को भयंकर, सोमरूपी अन्न का भक्षण करके अपना बल बढ़ाने वाले, दर्शनीय नासिका तथा हरि नाम के अश्वों से युक्त इंद्र हमें संपत्ति देने के लिए अपने समीपवर्ती बाहुओं में लौहनिर्मित वज्र धारण करते हैं. (४) आ पप्रौ पार्थिवं रजो बद्धे रोचना दिवि. न त्वावाँ इन्द्र कश्चन न जातो न जनिष्यतेऽति विश्वं ववक्षिथ.. (५) इंद्र ने अपने तेज से धरती एवं आकाश को व्याप्त किया है तथा आकाश में चमकीले नक्षत्र स्थापित किए हैं. हे इंद्र! तुम्हारी समानता करने वाला न कोई उत्पन्न हुआ है और न भविष्य में होगा. तुम संपूर्ण जगत् को धारण करने के इच्छुक हो. (५) यो अर्यो मर्तभोजनं पराददाति दाशुषे. इन्द्रो अस्मभ्यं शिक्षतु वि भजा भूरि ते वसु भक्षीय तव राधसः.. (६) पालनकर्त्ता एवं यजमान को मानव भोगोचित अन्न देने वाले इंद्र हमें भी उसी प्रकार का ebook converter DEMO Watermarks*