ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्न दें. हे इंद्र! हमें देने के लिए धन का बंटवारा कर दो, क्योंकि तुम्हारे पास असंख्य धन है. हम तुम्हारे धन का एक अंश प्राप्त करें. (६) मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुकतुः. सं गृभाय पुरू शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर.. (७) हे सोमपान द्वारा हर्षित होकर हमें गोसमूह देने वाले इंद्र! हमें देने के लिए अपने दोनों हाथों में अपरिमित धन ग्रहण करो. हमें तीक्ष्ण बुद्धियुक्त करो और धन प्रदान करो. (७) मादयस्व सुते सचा शवसे शूर राधसे. विद्वा हि त्वा पुरूवसुमप कामान्तसृज्महेऽथा नोऽविता भव.. (८) हे शौर्यसंपन्न इंद्र! सोम के निचुड़ जाने पर आकर हमें धन एवं बल देने के निमित्त सोमरस पीकर तृप्त बनो. हम तुम्हें विपुल धनसंपन्न जानते हैं तथा अपनी अभिलाषा तुम्हें बताते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (८) एते त इन्द्र जन्तवो विश्वं पुष्यन्ति वार्यम्. अन्तर्हि ख्यो जनानामर्यो वेदो अदाशुषां तेषां नो वेद आ भर.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे यजमान सबके उपभोग योग्य हवि को बढ़ाते हैं. हे समस्त जंतुओं के स्वामी! तुम हव्य न देने वालों का धन जानते हो. उनका धन हमें प्रदान करो. (९) सूक्त—८२ देवता—इंद्र उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथा इव. यदा नः सूनूतावतः कर आदर्थयास इद्योजा न्विन्द्र ते हरी.. (१) हे धनपति इंद्र! हमारे समीप आकर ही हमारी स्तुतियां सुनो. तुम पहले से भिन्न मत हो जाना. तुम जब हमें सत्य, प्रिया एवं स्तुतिरूपी वाणी से युक्त करते हो तभी हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. इस कारण अपने हरि नामक दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो. (१) अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत. अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (२) हे इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ अन्न खाकर यजमान तृप्त हुए हैं एवं प्रसन्नता व्याप्त करने के लिए उन्होंने अपना शरीर कंपित किया है. दीप्तिसंपन्न मेधावी विप्रों ने नवीन स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की है, इसलिए अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ो. (२) सुसंदृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि. प्र नूनं पूर्णवन्धुरः स्तुतो याहि वशाँ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (३)