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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

अन्न दें. हे इंद्र! हमें देने के लिए धन का बंटवारा कर दो, क्योंकि तुम्हारे पास असंख्य धन है. हम तुम्हारे धन का एक अंश प्राप्त करें. (६) मदेमदे हि नो ददिर्यूथा गवामृजुकतुः. सं गृभाय पुरू शतोभयाहस्त्या वसु शिशीहि राय आ भर.. (७) हे सोमपान द्वारा हर्षित होकर हमें गोसमूह देने वाले इंद्र! हमें देने के लिए अपने दोनों हाथों में अपरिमित धन ग्रहण करो. हमें तीक्ष्ण बुद्धियुक्त करो और धन प्रदान करो. (७) मादयस्व सुते सचा शवसे शूर राधसे. विद्वा हि त्वा पुरूवसुमप कामान्तसृज्महेऽथा नोऽविता भव.. (८) हे शौर्यसंपन्न इंद्र! सोम के निचुड़ जाने पर आकर हमें धन एवं बल देने के निमित्त सोमरस पीकर तृप्त बनो. हम तुम्हें विपुल धनसंपन्न जानते हैं तथा अपनी अभिलाषा तुम्हें बताते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (८) एते त इन्द्र जन्तवो विश्वं पुष्यन्ति वार्यम्. अन्तर्हि ख्यो जनानामर्यो वेदो अदाशुषां तेषां नो वेद आ भर.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे यजमान सबके उपभोग योग्य हवि को बढ़ाते हैं. हे समस्त जंतुओं के स्वामी! तुम हव्य न देने वालों का धन जानते हो. उनका धन हमें प्रदान करो. (९) सूक्त—८२ देवता—इंद्र उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथा इव. यदा नः सूनूतावतः कर आदर्थयास इद्योजा न्विन्द्र ते हरी.. (१) हे धनपति इंद्र! हमारे समीप आकर ही हमारी स्तुतियां सुनो. तुम पहले से भिन्न मत हो जाना. तुम जब हमें सत्य, प्रिया एवं स्तुतिरूपी वाणी से युक्त करते हो तभी हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. इस कारण अपने हरि नामक दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो. (१) अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत. अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (२) हे इंद्र! तुम्हारा दिया हुआ अन्न खाकर यजमान तृप्त हुए हैं एवं प्रसन्नता व्याप्त करने के लिए उन्होंने अपना शरीर कंपित किया है. दीप्तिसंपन्न मेधावी विप्रों ने नवीन स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की है, इसलिए अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ो. (२) सुसंदृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि. प्र नूनं पूर्णवन्धुरः स्तुतो याहि वशाँ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (३)

हे धनपति इंद्र! सबको अनुग्रहपूर्ण दृष्टि से देखने वाले तुम्हारी हम स्तुति करते हैं. हमारी स्तुति सुनकर तुम स्तोताओं को देने योग्य धन से रथ पूरित करके कामना करने वाले यजमानों के समीप आओ एवं इसके लिए अपने हरि नामक घोड़ों को रथ में जोड़ो. (३) स घा तं वृषणं रथमधि तिष्ठाति गोविन्दम्. यः पात्रं हारियोजनं पूर्णमिन्द्र चिकेतति योजा न्विन्द्र ते हरी.. (४) हे इंद्र! आप अन्न, सोम सहित गायों को देने में समर्थ हैं तथा दृढ़ रथ को भली प्रकार जानते हैं और उसी पर आरूढ़ होते हैं. अतः इंद्र देव अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो. (४) युक्तस्ते अस्तु दक्षिण उत सव्यः शतक्रतो. तेन जायामुप प्रियां मन्दानो याह्यन्धसो योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५) हे शतक्रतु! तुम्हारे रथ की दाईं एवं बाईं ओर घोड़े जुड़े हों. सोमरूप अन्न के उपभोग से मस्त होकर तुम उसी रथ द्वारा अपनी प्रेयसी के समीप जाओ. (५) युनज्मि ते ब्रह्मणा केशिना हरी उप प्र याहि दधिषे गभस्त्योः. उच्त्वा सुतासो रभसा अमन्दिषुः पूषण्वान्वज्रिन्त्समु पत्न्यामदः.. (६) हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारे शिखा वाले घोड़े को मैं स्तोत्र रूपी मंत्र की सहायता से तुम्हारे रथ में जोड़ता हूं. दोनों बाहुओं में घोड़ों की रास पकड़कर अपने घर जाओ. तुम निचोड़े हुए तीखे सोम से मतवाले होकर अपनी प्रेयसी के साथ मोद प्राप्त करो. (६) सूक्त—८३ देवता—इंद्र अश्वावति प्रथमो गोषु गच्छति सुप्रावीरिन्द्र मर्त्यस्तवोतिभिः. तमित्पृणक्षि वसुना भवीयसा सिन्धुमापो यथाभितो विचेतसः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा रक्षित मनुष्य बहुत से घोड़ों वाले घर में रहता हुआ सबसे पहले गाएं प्राप्त करता है. जिस प्रकार विचरणशील सरिताएं सभी दिशाओं में समुद्र को भरती हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने द्वारा रक्षित मनुष्य को विविध प्रकार के धन से युक्त करते हो. (१) आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः. प्राचैर्देवासः प्र णयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव.. (२) जिस समय चमकता हुआ जल चमस नामक यज्ञपात्र में आता है, उसी समय ऊपर रहने वाले देवों की सूर्यकिरण के समान विस्तृत दृष्टि यज्ञपात्र चमस पर पड़ती है. जैसे बहुत से वर एक ही कन्या से विवाह करना चाहते हैं, उसी प्रकार देवगण वेदी की उत्तर दिशा में रखे हुए इस सोमपूर्ण एवं देवप्रिय पात्र की अभिलाषा करते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं१ वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः. असंयत्तो व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते.. (३) हे इंद्र! अपने प्रति समर्पित यज्ञपात्र में तुमने मंत्ररूपी वचनों को मिला दिया है. ऐसे यज्ञपात्र वाला यजमान युद्धस्थल में न जाकर तुम्हारी पूजा में लीन रहकर पुष्ट होता है, क्योंकि तुम्हें निचुड़ा हुआ सोम देने वाला अवश्य शक्ति प्राप्त करता है. (३) आदङ्गिराः प्रथमं दधिरे वय इद्धाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया. सर्वं पणेः समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः.. (४) पहले पणियों द्वारा गाएं चुराने पर अंगिरा ऋषि ने इंद्र के लिए हवि प्रस्तुत किया था. इस कारण यज्ञ नेता अंगिरावंशियों ने गाय, अश्व एवं अन्य पशुओं से युक्त धन पाया था. (४) यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि. आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे.. (५) अथर्वा नामक ऋषि ने इंद्र संबंधी यज्ञ करके पणि द्वारा चुराई हुई गायों का मार्ग सबसे पहले जान लिया था. इसके पश्चात् यज्ञरक्षक एवं तेजस्वी सूर्यरूपी इंद्र प्रकट हुए एवं अथर्वा ने गाएं प्राप्त कीं. कवि के पुत्र उशना ने जिसकी सहायता की एवं जो असुरों को भगाने के लिए उत्पन्न हुए थे, ऐसे मरणरहित इंद्र की हम हवि द्वारा पूजा करते हैं. (५) बर्हिर्वा यत्स्वपत्याय वृज्यतेऽर्को वा श्लोकमाघोषते दिवि. ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्य१स्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति.. (६) शोभन फल वाले यज्ञ निमित्त जब-जब कुश काटे जाते हैं, तब-तब स्तोत्र बनाने वाला होता प्रकाशयुक्त यज्ञ में स्तोत्र बोलता है. जिस समय सोम कुचलने के काम आने वाला पत्थर स्तुतिकारी स्तोता के समान शब्द करता है, उस समय इंद्र प्रसन्न होते हैं. (६) सूक्त—८४ देवता—इंद्र असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि. आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियं रजः सूर्यो न रश्मिभिः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़ लिया गया है, अतएव हे बलशाली एवं शत्रुघर्षक! यज्ञस्थल में आओ. जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों द्वारा आकाश को भर देते हैं, उसी प्रकार सोमपान से उत्पन्न शक्ति तुम्हें पूर्ण करे. (१) इन्द्रमिद्धरी वहतोऽप्रतिधृष्टशवसम्. ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हरि नामक दोनों घोड़े अप्रधर्षित बल वाले इंद्र को वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा अन्य मनुष्यों की स्तुति एवं यज्ञ के समीप पहुंचावें. (२) आ तिष्ठ वृत्रहन्नथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी. अर्वाचीनं सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना.. (३) हे शत्रुविध्वंसकारी इंद्र! तुम्हारे दोनों घोड़ों को हमने मंत्र द्वारा रथ में जोड़ दिया है, इसलिए रथ पर चढ़ो. सोम कूटने के लिए प्रयुक्त पत्थर का शब्द तुम्हारा मन हमारी ओर फेरे. (३) इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदम्. शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने.. (४) हे इंद्र! अतिशय प्रशंसनीय, अमारक एवं मादक सोम को पिओ. यज्ञ संबंधी घर में वर्तमान तेजस्वी सोम की धाराएं तुम्हारी ओर बहती हैं. (४) इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन. सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः.. (५) हे ऋत्विजो! इंद्र का शीघ्र पूजन करो. इंद्र को लक्ष्य करके स्तुतियां करो. निचोड़ा हुआ सोम इंद्र को प्रसन्न करे. इसके पश्चात् परम प्रशंसनीय एवं शक्तिशाली इंद्र को प्रणाम करो. (५) नकिष्ट्वद्रथीत्तरो हरी यदिन्द्र यच्छसे. नकिष्ट्वानु मज्मना नकिः स्वश्व आनशे.. (६) हे इंद्र! जब तुम अपने हरि नामक अश्वों को रथ में जोड़ देते हो, उस समय तुमसे श्रेष्ठ रथी कोई नहीं होता. तुम्हारे समान बली एवं सुंदर अश्वों का स्वामी भी कोई नहीं है. (६) य एक इद्धिदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (७) हव्य देने वाले यजमान को धन देने वाले इंद्र, शीघ्र ही समस्त जगत् के ईश बन जाते हैं. (७) कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद्गिर इन्द्रो अङ्ग.. (८) जैसे बरसात में उगी छतरियों को सहज ही पैर से कुचल दिया जाता है, उसी प्रकार इंद्र यज्ञ न करने वालों का हनन करेंगे. इंद्र हमारी प्रार्थनाएं न जाने कब सुनेंगे? (८) ebook converter DEMO Watermarks*

यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति. उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (९) हे इंद्र! तुम निचुड़े हुए सोम द्वारा सेवा करने वाले यजमान को शीघ्र ही बल प्रदान करते हो. (९) स्वादोरित्था विषूवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः. या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (१०) श्वेत वर्ण गाएं रसयुक्त एवं सभी प्रकार के यज्ञों में व्यापक मधुर सोम का पान करती हैं. वे शोभा बढ़ाने के लिए कामवर्षी इंद्र के साथ चलती हुई प्रसन्न होती हैं. दूध देकर निवास करने वाली वे गाएं इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (१०) ता अस्य पृश्नायुवः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः. प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्रं हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (११) इंद्र को छूने की अभिलाषा करने वाली ये विभिन्न रंगों की गाएं इंद्र के पीने योग्य सोम को अपने दूध से मिश्रित कर देती हैं. ये गाएं इंद्र में ऐसा मद उत्पन्न करती हैं कि वे शत्रुनाशक वज्र को चला सकें. ये गाएं इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (११) ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः. व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (१२) प्रकृष्ट ज्ञान युक्त ये गाएं अपना दूध पिलाकर इंद्र की शक्ति बढ़ाती हैं. ये शत्रुओं की जानकारी के लिए इंद्र के शत्रु-विनाश आदि कर्म पहले ही बता देती हैं. इस प्रकार ये इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (१२) इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः. जघान नवतीर्नव.. (१३) प्रतिकूल शब्दरहित इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों द्वारा बने हुए वज्र से वृत्र आदि राक्षसों को आठ से दस बार हराया था. (१३) इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्. तद्विदच्छर्यणावति.. (१४) इंद्र ने अश्व संबंधी दधीचि के पर्वत में छिपे हुए मस्तक को पाने की इच्छा की एवं शर्यणावति नामक तालाब में प्राप्त किया. (१४) अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्. इत्था चन्द्रमसो गृहे.. (१५) इस गतिशील चंद्रमंडल में जो तेज छिपा है, वे सूर्य की किरणें हैं, ऐसा जानो. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्. आसन्निषून्हृत्स्वसो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात्.. (१६) आज यज्ञ में जाते हुए इंद्र के रथ के अग्र भाग में वीर्यकर्मयुक्त, तेजस्वी, शत्रुओं द्वारा असहनीय क्रोध से युक्त घोड़ों को कौन जोड़ सकता है? शत्रुओं पर प्रहार करने के लिए उन घोड़ों के मुख में बाण लगे हैं. वे अपने पैरों से शत्रुओं का हृदय कुचलकर मित्रों को प्रसन्न करते हैं. जो यजमान अश्वों की प्रशंसा करता है, वही जीवन प्राप्त करता है. (१६) क ईषते तुज्यते को बिभाय को मंसते सन्तमिन्द्रं को अन्ति. कस्तोकाय क इभायोत रायेऽधि ब्रवत्तन्वे३ को जनाय.. (१७) अनुग्रहकर्त्ता इंद्र के होते हुए शत्रुओं से भयभीत होकर कौन निकलता एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट होता है? अर्थात् कोई नहीं. हमारे समीपस्थ इंद्र को रक्षक के रूप में कौन जानता है? पुत्र की, अपनी, धन की एवं शरीर की रक्षा के लिए इंद्र की प्रार्थना कौन करता है? अर्थात् प्रार्थना के बिना ही इंद्र रक्षा करते हैं. (१७) को अग्निमीट्टे हविषा घृतेन सुचा यजाता ऋतुभिर्ध्रुवेभिः. कस्मै देवा आ वहानाशु होम को मंसते वीतिहोत्रः सुदेवः.. (१८) इंद्र को जानना कठिन है, इसलिए कौन यजमान इंद्र के निमित्त हवि देकर अग्नि की स्तुति करता है? वसंत आदि ऋतुओं को लक्षित करके सुच नामक पात्र में घी लेकर कौन इंद्र की पूजा करता है? किस यजमान के लिए देवगण अविलंब प्रशंसनीय धन देते हैं? यज्ञकर्त्ता एवं देवप्रिय कौन यजमान हैं जो इंद्र को जानता है? अर्थात् कोई नहीं. (१८) त्वमङ्ग प्र शंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्. न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्दितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (१९) हे शक्तिशाली इंद्र! तुम अपनी स्तुति करने वाले मनुष्य की प्रशंसा करो. हे मघवन्! तुम्हारे अतिरिक्त कोई सुख देने वाला नहीं है. इसी कारण मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. (१९) मा ते राधांसि मा त ऊतयो वसोऽस्मान्कदा चना दभन्. विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ.. (२०) हे निवासदाता इंद्र! तुम्हारे संबंधी प्राणिसमूह तथा सहायक मरुद्गण कभी हमारा विनाश न करें. हे मनुष्य हितकारक इंद्र! हम मंत्र द्रष्टाओं को सभी संपत्तियां दो. (२०) सूक्त—८५ देवता—मरुद्गण प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्नुद्रस्य सूनवः सुदंससः. ebook converter DEMO Watermarks*

रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः.. (१) गमन के निमित्त अपने शरीर को नारियों के समान अलंकृत करने वाले, गमनशील, रुद्र के पुत्र, धरती और आकाश की वृद्धि करने के कारण शोभन कर्मा, शत्रुओं को भगाने वाले एवं वृक्षादि के भंजनकर्ता मरुद्गण यज्ञ में सोमपान के कारण प्रसन्न होते हैं. (१) त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः. अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः.. (२) देवों द्वारा अभिषेक पाकर मरुद्गण ने महत्त्व प्राप्त किया है. उन रुद्रपुत्रों ने आकाश में स्थान पाया है. पूजा योग्य इंद्र की पूजा एवं उन्हें शक्तिशाली करके पृथ्वीपुत्र मरुतों ने अधिक ऐश्वर्य पाया है. (२) गोमातरो यच्छुभयन्ते अञ्जिभिस्तनूषु शुभ्रा दधिरे विरुक्मतः. बाधन्ते विश्वमभिमातिनमप वर्त्मान्येषामनु रीयते घृतम्.. (३) भूमिपुत्र मरुद्गण अपने को शोभासंपन्न करते समय उज्ज्वल आभूषण धारण करते हैं. ये सभी शत्रुओं का नाश करते हैं. इनके मार्ग का अनुगमन करके पानी बरसता है. (३) वि ये भ्राजन्ते सुमुखास ऋष्टिभिः प्रचयावयन्तो अच्युता चिदोजसा. मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम्.. (४) शोभन यज्ञ मरुद्गण आयुधों के कारण विशेष रूप से दीप्त होते हैं. वे स्वयं अच्युत रहकर दृढ़ पर्वत आदि को अपनी शक्ति द्वारा चंचल करते हैं. हे मरुद्गण! तुम जब अपने रथ में बुंदकियों वाली हरिणियों को जोड़ते हो, उस समय मन के समान गतिशील एवं वर्षा करने में समर्थ हो जाते हो. (४) प्र यद्रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं वाजे अद्रिं मरुतो रंहयन्तः. उतारुषस्य वि ष्यन्ति धाराश्चर्मेवोदभिर्व्युन्दन्ति भूम.. (५) हे मरुद्गण! अन्न उत्पत्ति के निमित्त बादलों को प्रेरित करते हुए बुंदकियों वाली हरिणियों को रथ में जोड़ो. उस समय प्रकाशशील सूर्य से निकलने वाली जलधारा समस्त धरती को भिगो देती है. (५) आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुपत्वानः प्र जिगात बाहुभिः. सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अंधसः.. (६) हे मरुद्गण! शीघ्र चलने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें हमारे यज्ञ में लावें. शीघ्र चलने वाले आप लोग भी हाथों में धन लेकर हमें देने के निमित्त आवें. आप वेदी पर बिछे हुए कुशों पर बैठिए एवं मधुर सोमरस को पीकर तृप्ति लाभ कीजिए. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

तेऽवर्धन्त स्वतवसो महित्वना नाकं तस्थुरुरु चक्रिये सदः. विष्णुर्यद्धावद्वृषणं मदच्युतं वयो न सीदन्नधि बर्हिषि प्रिये.. (७) अपनी शक्ति के सहारे वृद्धि प्राप्त करने एवं अपने ही महत्त्व से स्वर्ग में स्थान पाने वाले मरुद्गणों ने अपने निवासस्थल को विस्तीर्ण बनाया है. विष्णु आकर उन्हीं के निमित्त कामवर्षक एवं हर्षप्रद यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे पक्षियों के समान शीघ्र आकर हमारे यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर बैठें. (७) शूरा इवेद्युयुधयो न जग्मयः श्रवस्यवो न पृतनासु येतिरे. भयन्ते विश्वा भुवना मरुद्भ्यो राजान इव त्वेषसंदृशो नरः.. (८) शीघ्र चलने वाले मरुद्गण शूरों, युद्ध चाहने वालों एवं अन्नाभिलाषी पुरुषों के समान युद्धों में प्रयत्नशील हैं. वर्षा आदि के नेताओं एवं उग्ररूप मरुतों से संसार डरता है. (८) त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्ययं सहस्रभृष्टिं स्वपा अवर्तयत्. धत्त इन्द्रो नर्यापांसि कर्तवेऽहन्वृतं निरपामौब्जदर्णवम्.. (९) शोभनकर्मा त्वष्टा ने इंद्र को जो ठीक से बना हुआ, सुवर्णमय एवं हजार धारों वाला वज्र दिया था, उसी को संग्राम में शत्रुनाश करने के निमित्त उठाकर इंद्र ने वर्षाजल को रोकने वाले वृत्र को मारा एवं उसके द्वारा रोकी हुई जलधारा नीचे की ओर गिराई. (९) ऊर्ध्वं नुनुद्रेऽवतं त ओजसा दादृहाणं चिद्बिभिदुर्वि पर्वतम्. धमन्तो वाणं मरुतः सुदानवो मदे सोमस्य रण्यानि चक्रिरे.. (१०) मरुत् अपनी शक्ति से कुएं को उखाड़कर ले चले. रास्ते में पर्वतों ने बाधा डाली तो उन्हें तोड़ दिया. शोभनदानयुक्त मरुतों ने वीणा बजाते हुए एवं सोमरस पीकर आनंदित होते हुए रमणीय धन दिया. (१०) जिह्मं नुनुद्रेऽवतं तया दिशासिञ्चन्नुत्सं गोतमाय तृष्णजे. आ गच्छन्तीमवसा चित्रभानवः कामं विप्रस्य तर्पयन्त धामभिः.. (११) मरुद्गणों ने गौतम ऋषि की ओर कुआं टेढ़ा करके उन्हें पानी पिलाकर प्यास बुझाई. प्रकाश वाले मरुतों ने गौतम ऋषि की रक्षा के निमित्त आकर जीवनधारी जल से उन्हें तृप्त किया. (११) या वः शर्म शशमानाय सन्ति त्रिधातूनि दाशुषे यच्छताधि. अस्मभ्यं तानि मरुतो वि यन्त रयिं नो धत्त वृषणः सुवीरम्.. (१२) हे मरुद्गण! तुम अपने इष्टदाता यजमान को धरती आदि तीनों लोकों में अपने से संबंधित सुख प्रदान करो. हे कामवर्षक मरुतो! हमें पुत्रादि शोभन वीरों सहित धन दो. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८६ देवता—मरुद्गण

सूक्त—८६ देवता—मरुद्गण मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः.. (१) हे विशिष्ट प्रकाश वाले मरुतो! तुम अंतरिक्ष से आकर जिस यजमान के यज्ञगृह में सोमपान करते हो, वह शोभन रक्षकों वाला हो जाता है. (१) यज्ञैर्वा यज्ञवाहसो विप्रस्य वा मतीनाम्. मरुतः शृणुता हवम्.. (२) हे यज्ञ वहन करने वाले मरुतो! यज्ञकर्त्ता यजमान अथवा यज्ञरहित स्तोता का आह्वान सुनो. (२) उत वा यस्य वाजिनोऽनु विप्रमतक्षत. स गन्ता गोमति व्रजे.. (३) जिस यजमान का हव्य वहन करने के लिए ऋत्विज् मरुद्गण को तीक्ष्ण करते हैं, वह अनेक गायों वाले गोठ में जाता है. (३) अस्य वीरस्य बर्हिषि सुतः सोमो दिविष्टिषु. उक्थं मदश्च शस्यते.. (४) यजनीय दिवसों में यज्ञों में वीर मरुद्गणों के लिए सोम निचोड़ा जाता है एवं उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पढ़े जाते हैं. (४) अस्य श्रोषन्त्वा भुवो विश्वा यश्चर्षणीरभि. सूरं चित्सस्रुषीरिषः.. (५) समस्त शत्रुओं को पराजित करने वाले मरुद्गण यजमान की स्तुति सुनें एवं स्तोता को अन्न प्राप्त हो. (५) पूर्वीभिर्हि ददाशिम शरद्भिर्मरुतो वयम्. अवोभिश्चर्षणीनाम्.. (६) हे मरुद्गण! हम तुमसे अनेक वर्षों से रक्षित हैं एवं तुम्हें हव्य देते हैं. (६) सुभगः स प्रयज्यवो मरुतो अस्तु मर्त्यः. यस्य प्रयांसि पर्षथ.. (७) हे अतिशय यजनीय मरुद्गण! जिस यजमान का हव्य तुम स्वीकार करते हो, वह धनसंपन्न हो. (७) शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः. विदा कामस्य वेनतः.. (८) हे यथार्थबलसंपन्न नेता मरुतो! उन यजमानों की इच्छा पूरी करो जो तुम्हें लक्ष्य करके स्तुति मंत्र बोलते-बोलते पसीने से नहा उठे हैं एवं तुम्हारी कामना करते हैं. (८) यूयं तत्सत्यशवस आविष्कर्त महित्वना. विध्यता विद्युता रक्षः.. (९)

सूक्त—८७ देवता—मरुद्गण

हे यथार्थ शक्ति वाले मरुतो! तुम अपना उज्ज्वल महत्त्व प्रकट करके उपद्रवकारी राक्षसों को समाप्त करो. (९) गूहता गुह्यं तमो वि यात विश्वमत्रिणम्. ज्योतिष्कर्ता यदुश्मसि.. (१०) हे मरुद्गणो! सर्वत्र वर्तमान अंधकार को नष्ट करो, सबका भक्षण करने वाले राक्षसों को भगाओ एवं हमें मनचाहा प्रकाश दो. (१०) सूक्त—८७ देवता—मरुद्गण प्रत्वक्षसः प्रतवसो विरप्शिनोऽनानता अविथुरा ऋजीषिणः. जुष्टतमासो नृतमासो अञ्जिभिर्व्यानञ्ज्रे के चिदुस्रा इव स्तृभिः.. (१) शत्रुनाश में अति कुशल, प्रकृष्ट बलयुक्त, विविध जयघोषों से युक्त सर्वोत्कृष्ट, संघीभूत, यज्ञकर्त्ताओं द्वारा अतिशय सेवित, अवशिष्ट सोमरस का सेवन करने वाले, मेघ आदि के नेता मरुद्गण अपने शरीर पर धारण किए आभूषणों से आकाश में सूर्यकिरणों के समान चमकते हैं. (१) उपह्वरेषु यदचिध्वं ययिं वय इव मरुतः केन चित्पथा. श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते.. (२) हे मरुद्गणो! जिस प्रकार पक्षी आकाशमार्ग से शीघ्र चलते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे समीपवर्ती आकाश में जब चलते हुए बादलों को एकत्र करते हो तो मेघ तुम्हारे रथों से लिपटकर पानी बरसाने लगते हैं. इसी हेतु तुम अपनी पूजा करने वाले यजमानों पर मधु के समान स्वच्छ जल बरसाओ. (२) प्रैषामज्मेषु विथुरेव रेजते भूमिर्यामेषु यद्ध युञ्जते शुभे. ते क्रीळयो धुनयो भ्राजदृष्टयः स्वयं महित्वं पनयन्त धूतयः.. (३) जिस समय मरुद्गण शोभन जल की वर्षा के लिए बादलों को तैयार करते हैं, उस समय उठे हुए बादलों को देखकर धरती उसी प्रकार कांप उठती है, जिस प्रकार पतिविहीना नारी राजा आदि के उपद्रवों को देखकर कांपती है. इस प्रकार विहारशील, चंचल स्वभाव एवं चमकीले आयुधों वाले मरुद्गण पर्वत आदि को कंपित करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं. (३) स हि स्वसृतपृषदश्वो युवा गणो३ या ईशानस्तविषीभिरावृतः. असि सत्य ऋणयावानेद्योऽस्या धियः प्राविताथा वृषा गणः.. (४) स्वयं प्रेरित, सफेद बुंदकियों युक्त हरिणियों वाले, नित्य तरुण, असाधारण शक्तिसंपन्न, ebook converter DEMO Watermarks*

सत्यकर्मा, स्तोताओं को ऋणमुक्त करने वाले, अनिंदित एवं जलवर्षक मरुद्गण हमारे यज्ञ की रक्षा करते हैं। (४) पितुः प्रत्नस्य जन्मना वदामसि सोमस्य जिह्वा प्र जिगाति चक्षसा. यदिमिन्द्रं शम्यूक्वाण आशतादिन्नामानि यज्ञियानि दधिरे.. (५) हम अपने पिता रहूगण द्वारा बताई हुई बात कहते हैं कि सोमरस की आहुति के साथ की गई स्तुति मरुतों को प्राप्त होती है. इंद्र द्वारा संपन्न वृत्रवध के समय मरुद्गण उपस्थित थे और इंद्र की स्तुति कर रहे थे. इस प्रकार उन्होंने 'यज्ञपात्र' नाम धारण किया. (५) श्रियसे कं भानुभिः सं मिमिक्षिरे ते रश्मिभिस्त ऋक्वभिः सुखादयः. ते वाशीमन्त इष्मिणो अभीरवो विद्ने प्रियस्य मारुतस्य धाम्नः.. (६) मरुद्गण चमकती हुई सूर्य की किरणों के साथ वह जल बरसाना चाहते हैं, जिसकी प्राणियों को आवश्यकता है वे स्तोताओं और ऋत्विजों के साथ हव्य भक्षण करते हैं. शोभन स्तुतिवचन से युक्त, गतिशील एवं भयरहित मरुद्गणों ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किए हैं. (६) सूक्त—८८ देवता—मरुद्गण आ विद्युन्मद्भिर्मरुतः स्वर्कै रथेभिर्यात ऋष्टिमद्भिरश्वपर्णैः. आ वर्षिष्ठया न इषा वयो न पप्तता सुमायाः.. (१) हे मरुद्गणो! तुम अपने दीप्तिशाली, शोभन गति वाले, शस्त्रसंपन्न एवं घोड़ों वाले रथ पर चढ़कर हमारे यज्ञ में आओ. हे शोभनकर्मा मरुतो! हमें देने के लिए अन्न लेकर सुंदर पक्षी के समान आओ. (१) तेऽरुणेभिर्वरमा पिशङ्गैः शुभे कं यान्ति रथतूर्भिरश्वैः. रुक्मो न चित्रः स्वधितीवान्पव्या रथस्य जङ्घनन्त भूम.. (२) रथ को खींचने वाले लाल या पीले रंग के घोड़ों की सहायता से मरुद्गण किस स्तुतिकर्त्ता यजमान का कल्याण करने को आते हैं? चमकते हुए सोने के समान सुंदर एवं शत्रुनाशक आयुध से सुशोभित मरुद्गण रथ के पहियों द्वारा धरती को दुःखी करते हैं. (२) श्रिये कं वो अधि तनूषु वाशीर्मेधा वना न कृणवन्त ऊर्ध्वा. युष्मभ्यं कं मरुतः सुजातास्तुविद्युम्नासो धनयन्ते अद्रिम्.. (३) हे मरुद्गणो! तुम्हारे कंधों पर ऐश्वर्य के चिह्न रूप में शत्रुसंहारक आयुध हैं. वे वनों के समान यज्ञों को भी उन्नत करते हैं. हे शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हें प्रसन्न करने के लिए संपत्तिशाली यजमान सोम कुचलने वाले पत्थर को संपन्न करते हैं. (३)

अहानि गृध्राः पर्या व आगुरीमां धियं वार्कार्यां च देवीम्. ब्रह्म कृण्वन्तो गोतमासो अर्कैरूर्ध्वं नुनुद्र उत्सधिं पिबध्यै.. (४) हे जल के इच्छुक गौतमवंशी ऋषियो! तुम्हारे शोभन दिवसों ने आकर तुम्हारे उदक निष्पादक यज्ञों को सुशोभित किया था. उन्हीं दिनों में गौतमवंशी ऋषियों ने स्तुति उच्चारण के साथ हव्य देते हुए जल पीने के निमित्त कुआं ऊपर उठाया था. (४) एतत्त्यन्न योजनमचेति सस्वर्ह यन्मरुतो गोतमो वः. पश्यन्हिरण्यरथक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतो वराहून्.. (५) स्वर्णनिर्मित पहियों वाले रथों पर बैठे हुए, धारों वाले लौहचक्र से युक्त, इधर-उधर धावमान एवं शत्रुसंहारक मरुद्गणों को देखकर गौतम ऋषि ने जो स्तोत्र बोला था, वह यही है. (५) एषा स्या वो मरुतो ऽनुभर्त्री प्रति ष्टोभति वाघतो न वाणी. अस्तोभयदवृथासामनु स्वधां गभस्त्योः.. (६) हे मरुद्गणो! हमारी स्तुति आपके अनुकूल है एवं आपमें से प्रत्येक का गुणगान करती है. इस समय इन स्तोत्रों द्वारा ऋषियों की वाणी ने अनायास ही आपका यशगान किया है, क्योंकि आपने अनेक प्रकार का अन्न हमारे हाथों पर रख दिया है. (६) सूक्त—८९ देवता—विश्वेदेव आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः. देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे.. (१) समस्त कल्याणकारक, असुरों द्वारा अहिंसित एवं शत्रुनाश में समर्थ यज्ञ सब ओर से हमें प्राप्त हों. अपने रक्षण कार्य का त्याग न करने वाले एवं प्रतिदिन हमारी रक्षा करने वाले देवगण हमें सदा बढ़ावें. (१) देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्. देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे.. (२) अपने यजमानों से प्रेम करने वाले देवों का कल्याणकारक अनुग्रह एवं दान हमें प्राप्त हो. हम उनकी मित्रता प्राप्त करें, वे हमारी आयु में वृद्धि करें. (२) तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्. अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्.. (३) हम वेदरूपी पूर्वकालीन वाणी द्वारा भग, मित्र, अदिति, दक्ष, मरुद्गण, अर्यमा, वरुण, ebook converter DEMO Watermarks*

सोम, अश्विनीकुमार आदि देवों को बुलाते हैं. शोभन धन से युक्त सरस्वती हमें सुखी करें. (३) तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः. तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्.. (४) माता के समान वायु, पिता के तुल्य धरती, आकाश एवं सोम कुचलने के साधन पत्थर हमारे पास सुखकारक ओषधि ले आवें. हे बुद्धिसंपन्न अश्विनीकुमारो! आप लोग हमारी प्रार्थना सुनें. (४) तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्. पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये.. (५) ऐश्वर्यसंपन्न, स्थावर-जंगम के स्वामी एवं यज्ञकर्मों से प्रसन्न होने वाले इंद्र को हम अपनी रक्षा के निमित्त बुला रहे हैं. दूसरों द्वारा अहिंसित पूषा जिस प्रकार हमारा धन बढ़ाने के लिए रक्षा कर रहे हैं, उसी प्रकार हमारे अविनाश के लिए हमारी रक्षा करें. (५) स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु.. (६) अगणित स्तुतियों के योग्य और सर्वज्ञ पूषा हमारा कल्याण करें. जिनके रथ के पहियों को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता है, ऐसे गरुड़ एवं बृहस्पति हमारा कल्याण करें. (६) पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः. अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह.. (७) सफेद बूंदों से युक्त घोड़ों वाले, नाना वर्ण वाली गौओं के पुत्र, शोभन गतिशील, अग्नि की जीभ पर वर्तमान, सब कुछ जानने वाले एवं सूर्य के समान नेत्रज्योतियुक्त मरुद्गण हमारी रक्षा के निमित्त यहां आवें. (७) भंद्र कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः. स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः... (८) हे देवो! हम अपने कानों से कल्याणकारक वचन सुनें. हे यज्ञपात्र देवो! हम अपनी आंखों से शोभन वस्तु देखें एवं दृढ़ हस्तचरणादि वाले शरीर से आपकी स्तुति करते हुए प्रजापति द्वारा स्थापित आयु को प्राप्त करें. (८) शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्. पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः... (९) हे देवो! आप लोगों ने मानवों की आयु सौ वर्ष निश्चित की है. इसी काल में आप हमारे ebook converter DEMO Watermarks*

शरीर में वृद्धावस्था उत्पन्न करते हैं. उस अवस्था में पुत्र हमारे रक्षक बन जाते हैं. हमें उस अवस्था के मध्य में नष्ट मत करना. (९) अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः. विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (१०) आकाश, अंतरिक्ष, माता, पिता, समस्त देव, पंचजन, जन्म और जन्म का कारण—ये सब अखंडनीय अर्थात् अदिति हैं. (१०) सूक्त—९० देवता—विश्वेदेव ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान्. अर्यमा देवैः सजोषाः.. (१) उत्तम स्थान को जानने वाले वरुण, मित्र एवं इंद्र आदि देवों के साथ समान प्रेम रखने वाले अर्यमा हमें सरल मार्ग से गंतव्य पर पहुंचावें. (१) ते हि वस्वो वसवानास्ते अप्रमूरा महोभिः. व्रता रक्षन्ते विश्वाहा.. (२) धन देने वाले, मूढ़ताशून्य एवं बुद्धिसंपन्न वे देव अपने तेज द्वारा सदा संसार की रक्षा कर अपना कर्म करते हैं. (२) ते अस्मभ्यं शर्म यंसन्नमृता मर्त्येभ्यः. बाधमाना अप द्विषः.. (३) वे मरणरहित देव हमारे शत्रुओं का नाश करके हम मरणशीलों को सुख दें. (३) वि नः पथः सुविताय चियन्त्विन्द्रो मरुतः. पूषा भगो वन्द्यासः.. (४) स्तुति के योग्य इंद्र, मरुद्गण, पूषा एवं भग हमें स्वर्गलाभ के निमित्त उत्तम मार्ग दिखावें. (४) उत नो धियो गोअग्राः पूषन्विष्णवेवयावः. कर्ता नः स्वस्तिमतः.. (५) हे पूषा, विष्णु और मरुद्गण! हमारे यज्ञों को गाय आदि पशुओं से युक्त एवं हमें विनाशरहित बनाओ. (५) मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः. माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः.. (६) यजमान के लिए हवाएं एवं नदियां मधु की वर्षा करें. हमारे लिए ओषधियां माधुर्ययुक्त हों. (६) मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः. मधु द्यौरस्तु नः पिता.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हमारी निशाएं एवं उषाएं माधुर्ययुक्त हों. पृथ्वी से संबंध रखने वाले जन एवं सबका पालनकर्त्ता आकाश हमें सुखद हो. (७) मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्य:. माध्वीर्गावो भवन्तु न:.. (८) वनस्पतियां, सूर्य एवं गाएं हमारे लिए मधुयुक्त हों. (८) शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा. शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः.. (९) मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति एवं लंबे डग भरने वाले विष्णु हमारे लिए सुखदाता हों. (९) सूक्त—९१ देवता—सोम त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम्. तव प्रणीती पितरो न इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीरा:.. (१) हे सोम! तुम हमारी बुद्धि द्वारा भली-भांति ज्ञात हो. तुम हमें सरल मार्ग से ले चलो. हे विश्व को अमृतमय करने वाले सोम! तुम्हारे निर्देश के अनुसार चलकर हमारे पितरों ने देवों के मध्य धन प्राप्त किया था. (१) त्वं सोम क्रतुभिः सुक्रतुर्भूस्त्वं दक्षैः सुदक्षो विश्ववेदा:. त्वं वृषा वृषत्वेभिर्महित्वा द्युम्नेभिर्द्युम्न्यभवो नृचक्षा:.. (२) हे सर्वज्ञ सोम! तुम अपने शोभन यज्ञों के कारण यज्ञसंपन्न करने वाले, अपने बल द्वारा शक्तिशाली एवं अभीष्ट वर्षा के महत्त्व से कामवर्धक हो. तुम यजमानों के मनोवांछित फलदाता होकर उनके द्वारा विपुल मात्रा में दिए गए अन्न से संपन्न हो. (२) राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम. शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम.. (३) हे सोम! ब्राह्मणों के राजा वरुण से संबंधित यज्ञ तुम्हारे ही हैं, इसलिए तुम्हारा तेज विस्तृत एवं गंभीर है. तुम वरुण के समान सबके सुधारकर्त्ता एवं अर्यमा के समान वृद्धि करने वाले हो. (३) या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु. तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेळन्नराजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय.. (४) हे शोभनयुक्त सोम! आकाश, धरती, पर्वतों, ओषधियों एवं जल में वर्तमान अपने तेज ebook converter DEMO Watermarks*

से तेजस्वी होकर क्रोध न करते हुए हमारा हव्य स्वीकार करो. (४) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा. त्वं भद्रो असि क्रतुः.. (५) हे सोम! तुम सत्कर्मों में ब्राह्मणों के स्वामी, तेजस्वी एवं शोभन यज्ञों वाले हो. (५) त्वं च सोम नो वशो जीवातुं न मरामहे. प्रियस्तोत्रो वनस्पतिः.. (६) हे स्तुतिप्रिय एवं वनस्पतिपालक सोम! यदि तुम हम यजमानों के लिए जीवनदायिनी ओषधि की अभिलाषा करो तो हम मृत्युरहित हो सकते हैं. (६) त्वं सोम महे भगं त्वं यून ऋतायते. दक्षं दधासि जीवसे.. (७) हे सोम! तुम वृद्ध एवं युवा यजमान को जीवनोपयोगी धन देते हो. (७) त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजनघायतः. न रिष्येत्त्वावतः सखा.. (८) हे तेजस्वी सोम! जो लोग हमें दुःख देना चाहते हैं, उनसे हमें बचाओ, क्योंकि तुम जैसे देव का मित्र कभी विनष्ट नहीं होता. (८) सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे. ताभिर्नोऽविता भव.. (९) हे सोम! यजमानों को देने के लिए तुम्हारे पास सुखद रक्षासाधन हैं, उन्हीं के द्वारा हमारे रक्षक बनो. (९) इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि. सोम त्वं नो वृधे भव.. (१०) हे सोम! हमारे इस यज्ञ और स्तुतिवचन को स्वीकार करके हमारे समीप आओ और हमारे यज्ञ की वृद्धि करो. (१०) सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धयामो वचोविदः. सुमृळीको न आ विश.. (११) हे सोम! स्तुतियों के जानने वाले हम लोग स्तुतिवचनों से तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम हमें सुखी करते हुए आओ. (११) गयस्फानो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः. सुमित्रः सोम नो भव.. (१२) हे सोम! तुम हमारे धनवर्द्धक, रोगनाशक, संपत्तिदाता, संपत्ति बढ़ाने वाले एवं सुमित्र बनो. (१२) सोम रारन्धि नो हृदि गावो न यवसेष्वा. मर्य इव स्व ओक्ये.. (१३) हे सोम! जिस प्रकार गाएं सुंदर घास से एवं मनुष्य अपने घर में रहने से प्रसन्न होते हैं, ebook converter DEMO Watermarks*

उसी प्रकार तुम हमारे द्वारा दिए गए हव्य से तृप्त होकर हमारे हृदय में निवास करो. (१३) यः सोमः सख्ये तव रारणद्देव मर्त्यः. तं दक्षः सचते कविः.. (१४) हे सर्वदर्शी एवं सर्वकार्य समर्थ सोम! तुम्हारी मित्रता के कारण जो यजमान तुम्हारी स्तुति करता है, तुम उस पर अनुग्रह करते हो. (१४) उरुष्या णो अभिशस्तेः सोम नि पाह्यंहसः. सखा सुशेव एधि नः.. (१५) हे सोम! हमें निंदा एवं पाप से बचाओ तथा शोभन सुख देकर हमारे हितकारी बनो. (१५) आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (१६) हे सोम! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं तुम्हें चारों ओर अपनी शक्ति प्राप्त हो. तुम हमें अन्न देने वाले बनो. (१६) आ प्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभिः. भवा नः सुश्रवस्तमः सखा वृधे.. (१७) हे अतिशय मदयुक्त सोम! तुम समस्त लताओं के भागों से वृद्धि प्राप्त करो एवं शोभन अन्न से युक्त होकर हमारे मित्र बनो. (१७) सं ते पयांसि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः. आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व.. (१८) हे शत्रुनाशक सोम! तुम में दूध, अन्न एवं वीर्य सम्मिलित हो. तुम हमारी अमरता के लिए बढ़ते हुए स्वर्ग में उत्कृष्ट अन्न धारण करो. (१८) या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्. गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्.. (१९) हे सोम! यजमान हव्य के द्वारा तुम्हारे जिन तेजों की पूजा करते हैं, वे ही हमारे यज्ञ को चारों ओर प्राप्त हों. हे धनवर्द्धक! पाप से रक्षा करने वाले, शोभन वीरों से युक्त एवं पुत्रों के रक्षक सोम! तुम हमारे घरों में आओ. (१९) सोमो धेनुं सोमो अर्वन्तमाशुं सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति. सादन्यं विदथ्यं सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै.. (२०) जो यजमान सोमदेव को हवि रूप अन्न देता है, उसे वे दुधारू गाय, शीघ्रगामी अश्व एवं लौकिक कर्म करने में कुशल, गृहकार्य में दक्ष, यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला, सकल ebook converter DEMO Watermarks*

शास्त्रज्ञाता तथा पिता का नाम प्रसिद्ध करने वाला पुत्र देते हैं. (२०) अषाळ्हं युत्सु पृतनासु पप्रिं स्वर्षामप्सां वृजनस्य गोपाम्. भरेषुजां सुक्षितिं सुश्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेम सोम.. (२१) हे सोम! हम युद्ध में नित्य विजयी, सेनाओं को विजयी बनाने वाले, स्वर्ग के दाता, जलवर्षक, बल के रक्षक, यज्ञ में प्रादुर्भूत, सुंदर निवास वाले, उत्तम यश वाले एवं शत्रुपराभवकारी तुम्हें लक्ष्य करके प्रसन्न हों. (२१) त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः. त्वमा ततन्थोर्व१न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (२२) हे सोम! तुमने धरती पर वर्तमान समस्त ओषधियां, वर्षा का जल एवं गाएं बनाई हैं. तुमने विस्तीर्ण आकाश को फैलाया एवं प्रकाश द्वारा उसका अंधकार मिटाया है. (२२) देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागं सहसावन्नभि युध्य. मा त्वा तनदीशिशे वीर्यस्योभयेभ्यः प्र चिकित्सा गविष्टौ.. (२३) हे बलवान् सोमदेव! हमारे धन का अपहरण करने वाले शत्रुओं से युद्ध करो. कोई भी शत्रु तुम्हें नष्ट न करे. युद्धरत दोनों पक्षों के बल के स्वामी तुम्हीं हो. युद्ध में हमारे उपद्रवों का नाश करो. (२३) सूक्त—९२ देवता—उषा एवं अश्विनीकुमार एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते. निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावोऽरुषीर्यन्ति मातरः.. (१) उषाओं ने अंधकार से ढके संसार का ज्ञान कराने वाला प्रकाश किया है. ये आकाश के पूर्व भाग में सूर्य का प्रकाश करती हैं. जैसे आक्रमणशील योद्धा अपने आयुधों का संस्कार करते हैं, उसी प्रकार गतिशील, चमकीली एवं सूर्यप्रकाश का निर्माण करने वाली उषाएं अपने प्रकाश से संसार का सुधार करती हुई प्रतिदिन आती हैं. (१) उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्त. अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः.. (२) चमकती हुई सूर्यरश्मियां अनायास उदित हुईं. उषाओं ने रथ में जोतने योग्य शुभ्र किरणों को रथ में जोता एवं पूर्वकाल के समान समस्त प्राणियों को ज्ञानशील बनाया. इसके पश्चात् चमकीली उषाओं ने शुभ्र वर्ण वाले सूर्य का आश्रय लिया. (२) अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः. ebook converter DEMO Watermarks*

इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते.. (३) नेतृत्व करने वाली उषाएं, शोभन कर्म करने वाले, सोमरस निचोड़ने एवं ऋत्विजों को दक्षिणा देने वाले यजमान के लिए समस्त अन्न प्रदान करती हुईं अस्त्रधारी योद्धाओं के समान अपने उपयोग द्वारा दूर तक के देशों को भी तेज से पूरित करती हैं. (३) अधि पेशांसि वपते नृतूरिवापोर्णुते वक्ष उस्रेव बर्जहम्. ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वती गावो न व्रजं व्युषा आवर्तमः.. (४) जिस प्रकार नाई बालों को काट देता है, उसी प्रकार उषाएं संसार से लिपटे हुए काले अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं. जिस प्रकार गौ दूध काढ़ने के समय अपना थन प्रकट करती है, उसी प्रकार उषाएं अपने सीने को प्रकट करती हैं. वे गोशाला में जाने वाली गायों के समान पूर्व दिशा में जाती हैं. (४) प्रत्यर्ची रुशदस्या अदर्शि वि तिष्ठते बाधते कृष्णमभ्वम्. स्वरुं न पेशो विदथेष्वञ्जञ्चित्रं दिवो दुहिता भानुमश्रेत्.. (५) उषा का दीप्यमान तेज पहले पूर्व दिशा में दिखाई देता है, इसके बाद सभी दिशाओं में फैल जाता है एवं काले रंग के अंधकार को दूर भगा देता है. जैसे अध्वर्यु यज्ञों में यूप को आज्य द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही उषाएं आकाश में अपना रूप दिखाती है एवं स्वर्गपुत्री बनकर तेजस्वी सूर्य की सेवा करती हैं. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति. श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजीगः.. (६) हम रात्रि के अंधकार के पार आ गए हैं. निशा के अंधकार का नाश करती हुई उषा समस्त प्राणियों को ज्ञान देती है. जिस प्रकार वशीकरण में समर्थ पुरुष धनी के समीप जाकर उसे प्रसन्न करने के लिए हंसता है, उसी प्रकार प्रकाश फैलाती हुईं उषाएं हंसती सी जान पड़ती हैं. सुंदर शरीर वाली उषाओं ने सबकी प्रसन्नता के लिए अंधकार का भक्षण किया है. (६) भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः. प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान्.. (७) हम गौतमवंशी तेजस्विनी एवं सत्य भाषण प्रेमियों का नेतृत्व करने वाली आकाशपुत्री उषा की स्तुति करते हैं. हे उषा! हमें पुत्र, पौत्र, दास, अश्व एवं गायों से युक्त अन्न प्रदान करो. (७) उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्गं रयिमश्वबुध्यम्. सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे उषा! हम यश, वीर पुरुषों, दासों एवं अश्वों से युक्त अन्न प्राप्त करें. हे शोभन धन वाली उषा! शोभनयज्ञ युक्त स्तोत्र से प्रसन्न होकर हमारे लिए अन्न एवं पर्याप्त धन प्रकट करो. (८) विश्वानि देवी भुवनाभिचक्ष्या प्रतीची चक्षुरुर्विया वि भाति. विश्वं जीवं चरसे बोधयन्ती विश्वस्य वाचमविद्वन्मनायो:.. (९) चमकती हुई उषाएं समस्त प्राणियों को प्रकाशित करने के पश्चात् पश्चिम दिशा में अपने तेज से विस्तृत होती हुई उद्दीप्त हो रही हैं. वे समस्त जीवों को अपने-अपने काम में प्रवृत्त होने के लिए जगाती हैं एवं भाषणकुशल लोगों की बातें सुनती हैं. (९) पुनः पुनर्जायमाना पुराणी समानं वर्णमभि शुम्भमाना. श्वघ्नीव कृत्नुर्विज आमिनाना मर्तस्य देवी जरयन्त्यायु:.. (१०) प्रतिदिन बार-बार उत्पन्न, नित्य एवं समान रूप धारण करने वाली उषाएं समस्त मरणधर्मा प्राणियों के जीवन का दिन-दिन उसी प्रकार ह्रास करती हैं, जिस प्रकार भीलनी उड़ते हुए पक्षियों के पंख काटकर उनकी हिंसा करती है. (१०) व्यूर्णवती दिवो अन्ताँ अबोध्यप स्वसारं सनुतर्युयोति. प्रमिनती मनुष्या युगानि योषा जारस्य चक्षसा वि भाति.. (११) आकाश को अंधकार से मुक्त करती हुई उषाओं को लोग जानते हैं. वे अपने आप चलती हुई रात को छिपाती हैं. अपने गमनागमन से प्रतिदिन मानवों के युगों को समाप्त करती हुई प्रेमी सूर्य की पत्नियां उषाएं प्रकाशित होती हैं. (११) पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्. अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिर्दृशाना.. (१२) जैसे ग्वाला वन में पशुओं को चरने के लिए फैला देता है, उसी प्रकार सुभगा एवं पूजनीया उषाएं तेज का विस्तार करती हैं. जैसे बहता हुआ पानी नीची जगह पर शीघ्र फैल जाता है, वैसे ही महती उषाएं सारे विश्व को घेर लेती हैं एवं देवयज्ञों में विघ्न न डालती हुईं सूर्य की किरणों के साथ दिखाई देती हैं. (१२) उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (१३) हे अन्न की स्वामिनी उषाओ! हमें ऐसा विचित्र धन दो, जिससे हम पुत्रों और पौत्रों का पालन कर सकें. (१३) उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि. रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*