भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 296

को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्. आसन्निषून्हृत्स्वसो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात्.. (१६) आज यज्ञ में जाते हुए इंद्र के रथ के अग्र भाग में वीर्यकर्मयुक्त, तेजस्वी, शत्रुओं द्वारा असहनीय क्रोध से युक्त घोड़ों को कौन जोड़ सकता है? शत्रुओं पर प्रहार करने के लिए उन घोड़ों के मुख में बाण लगे हैं. वे अपने पैरों से शत्रुओं का हृदय कुचलकर मित्रों को प्रसन्न करते हैं. जो यजमान अश्वों की प्रशंसा करता है, वही जीवन प्राप्त करता है. (१६) क ईषते तुज्यते को बिभाय को मंसते सन्तमिन्द्रं को अन्ति. कस्तोकाय क इभायोत रायेऽधि ब्रवत्तन्वे३ को जनाय.. (१७) अनुग्रहकर्त्ता इंद्र के होते हुए शत्रुओं से भयभीत होकर कौन निकलता एवं शत्रुओं द्वारा नष्ट होता है? अर्थात् कोई नहीं. हमारे समीपस्थ इंद्र को रक्षक के रूप में कौन जानता है? पुत्र की, अपनी, धन की एवं शरीर की रक्षा के लिए इंद्र की प्रार्थना कौन करता है? अर्थात् प्रार्थना के बिना ही इंद्र रक्षा करते हैं. (१७) को अग्निमीट्टे हविषा घृतेन सुचा यजाता ऋतुभिर्ध्रुवेभिः. कस्मै देवा आ वहानाशु होम को मंसते वीतिहोत्रः सुदेवः.. (१८) इंद्र को जानना कठिन है, इसलिए कौन यजमान इंद्र के निमित्त हवि देकर अग्नि की स्तुति करता है? वसंत आदि ऋतुओं को लक्षित करके सुच नामक पात्र में घी लेकर कौन इंद्र की पूजा करता है? किस यजमान के लिए देवगण अविलंब प्रशंसनीय धन देते हैं? यज्ञकर्त्ता एवं देवप्रिय कौन यजमान हैं जो इंद्र को जानता है? अर्थात् कोई नहीं. (१८) त्वमङ्ग प्र शंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्. न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्दितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (१९) हे शक्तिशाली इंद्र! तुम अपनी स्तुति करने वाले मनुष्य की प्रशंसा करो. हे मघवन्! तुम्हारे अतिरिक्त कोई सुख देने वाला नहीं है. इसी कारण मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. (१९) मा ते राधांसि मा त ऊतयो वसोऽस्मान्कदा चना दभन्. विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ.. (२०) हे निवासदाता इंद्र! तुम्हारे संबंधी प्राणिसमूह तथा सहायक मरुद्गण कभी हमारा विनाश न करें. हे मनुष्य हितकारक इंद्र! हम मंत्र द्रष्टाओं को सभी संपत्तियां दो. (२०) सूक्त—८५ देवता—मरुद्गण प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्नुद्रस्य सूनवः सुदंससः. ebook converter DEMO Watermarks*

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