भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 297

रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः.. (१) गमन के निमित्त अपने शरीर को नारियों के समान अलंकृत करने वाले, गमनशील, रुद्र के पुत्र, धरती और आकाश की वृद्धि करने के कारण शोभन कर्मा, शत्रुओं को भगाने वाले एवं वृक्षादि के भंजनकर्ता मरुद्गण यज्ञ में सोमपान के कारण प्रसन्न होते हैं. (१) त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः. अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः.. (२) देवों द्वारा अभिषेक पाकर मरुद्गण ने महत्त्व प्राप्त किया है. उन रुद्रपुत्रों ने आकाश में स्थान पाया है. पूजा योग्य इंद्र की पूजा एवं उन्हें शक्तिशाली करके पृथ्वीपुत्र मरुतों ने अधिक ऐश्वर्य पाया है. (२) गोमातरो यच्छुभयन्ते अञ्जिभिस्तनूषु शुभ्रा दधिरे विरुक्मतः. बाधन्ते विश्वमभिमातिनमप वर्त्मान्येषामनु रीयते घृतम्.. (३) भूमिपुत्र मरुद्गण अपने को शोभासंपन्न करते समय उज्ज्वल आभूषण धारण करते हैं. ये सभी शत्रुओं का नाश करते हैं. इनके मार्ग का अनुगमन करके पानी बरसता है. (३) वि ये भ्राजन्ते सुमुखास ऋष्टिभिः प्रचयावयन्तो अच्युता चिदोजसा. मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम्.. (४) शोभन यज्ञ मरुद्गण आयुधों के कारण विशेष रूप से दीप्त होते हैं. वे स्वयं अच्युत रहकर दृढ़ पर्वत आदि को अपनी शक्ति द्वारा चंचल करते हैं. हे मरुद्गण! तुम जब अपने रथ में बुंदकियों वाली हरिणियों को जोड़ते हो, उस समय मन के समान गतिशील एवं वर्षा करने में समर्थ हो जाते हो. (४) प्र यद्रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं वाजे अद्रिं मरुतो रंहयन्तः. उतारुषस्य वि ष्यन्ति धाराश्चर्मेवोदभिर्व्युन्दन्ति भूम.. (५) हे मरुद्गण! अन्न उत्पत्ति के निमित्त बादलों को प्रेरित करते हुए बुंदकियों वाली हरिणियों को रथ में जोड़ो. उस समय प्रकाशशील सूर्य से निकलने वाली जलधारा समस्त धरती को भिगो देती है. (५) आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुपत्वानः प्र जिगात बाहुभिः. सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अंधसः.. (६) हे मरुद्गण! शीघ्र चलने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें हमारे यज्ञ में लावें. शीघ्र चलने वाले आप लोग भी हाथों में धन लेकर हमें देने के निमित्त आवें. आप वेदी पर बिछे हुए कुशों पर बैठिए एवं मधुर सोमरस को पीकर तृप्ति लाभ कीजिए. (६) ebook converter DEMO Watermarks*