ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेऽवर्धन्त स्वतवसो महित्वना नाकं तस्थुरुरु चक्रिये सदः. विष्णुर्यद्धावद्वृषणं मदच्युतं वयो न सीदन्नधि बर्हिषि प्रिये.. (७) अपनी शक्ति के सहारे वृद्धि प्राप्त करने एवं अपने ही महत्त्व से स्वर्ग में स्थान पाने वाले मरुद्गणों ने अपने निवासस्थल को विस्तीर्ण बनाया है. विष्णु आकर उन्हीं के निमित्त कामवर्षक एवं हर्षप्रद यज्ञ की रक्षा करते हैं. वे पक्षियों के समान शीघ्र आकर हमारे यज्ञ में बिछे हुए कुशों पर बैठें. (७) शूरा इवेद्युयुधयो न जग्मयः श्रवस्यवो न पृतनासु येतिरे. भयन्ते विश्वा भुवना मरुद्भ्यो राजान इव त्वेषसंदृशो नरः.. (८) शीघ्र चलने वाले मरुद्गण शूरों, युद्ध चाहने वालों एवं अन्नाभिलाषी पुरुषों के समान युद्धों में प्रयत्नशील हैं. वर्षा आदि के नेताओं एवं उग्ररूप मरुतों से संसार डरता है. (८) त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्ययं सहस्रभृष्टिं स्वपा अवर्तयत्. धत्त इन्द्रो नर्यापांसि कर्तवेऽहन्वृतं निरपामौब्जदर्णवम्.. (९) शोभनकर्मा त्वष्टा ने इंद्र को जो ठीक से बना हुआ, सुवर्णमय एवं हजार धारों वाला वज्र दिया था, उसी को संग्राम में शत्रुनाश करने के निमित्त उठाकर इंद्र ने वर्षाजल को रोकने वाले वृत्र को मारा एवं उसके द्वारा रोकी हुई जलधारा नीचे की ओर गिराई. (९) ऊर्ध्वं नुनुद्रेऽवतं त ओजसा दादृहाणं चिद्बिभिदुर्वि पर्वतम्. धमन्तो वाणं मरुतः सुदानवो मदे सोमस्य रण्यानि चक्रिरे.. (१०) मरुत् अपनी शक्ति से कुएं को उखाड़कर ले चले. रास्ते में पर्वतों ने बाधा डाली तो उन्हें तोड़ दिया. शोभनदानयुक्त मरुतों ने वीणा बजाते हुए एवं सोमरस पीकर आनंदित होते हुए रमणीय धन दिया. (१०) जिह्मं नुनुद्रेऽवतं तया दिशासिञ्चन्नुत्सं गोतमाय तृष्णजे. आ गच्छन्तीमवसा चित्रभानवः कामं विप्रस्य तर्पयन्त धामभिः.. (११) मरुद्गणों ने गौतम ऋषि की ओर कुआं टेढ़ा करके उन्हें पानी पिलाकर प्यास बुझाई. प्रकाश वाले मरुतों ने गौतम ऋषि की रक्षा के निमित्त आकर जीवनधारी जल से उन्हें तृप्त किया. (११) या वः शर्म शशमानाय सन्ति त्रिधातूनि दाशुषे यच्छताधि. अस्मभ्यं तानि मरुतो वि यन्त रयिं नो धत्त वृषणः सुवीरम्.. (१२) हे मरुद्गण! तुम अपने इष्टदाता यजमान को धरती आदि तीनों लोकों में अपने से संबंधित सुख प्रदान करो. हे कामवर्षक मरुतो! हमें पुत्रादि शोभन वीरों सहित धन दो. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*