भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 299

सूक्त—८६ देवता—मरुद्गण मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः.. (१) हे विशिष्ट प्रकाश वाले मरुतो! तुम अंतरिक्ष से आकर जिस यजमान के यज्ञगृह में सोमपान करते हो, वह शोभन रक्षकों वाला हो जाता है. (१) यज्ञैर्वा यज्ञवाहसो विप्रस्य वा मतीनाम्. मरुतः शृणुता हवम्.. (२) हे यज्ञ वहन करने वाले मरुतो! यज्ञकर्त्ता यजमान अथवा यज्ञरहित स्तोता का आह्वान सुनो. (२) उत वा यस्य वाजिनोऽनु विप्रमतक्षत. स गन्ता गोमति व्रजे.. (३) जिस यजमान का हव्य वहन करने के लिए ऋत्विज् मरुद्गण को तीक्ष्ण करते हैं, वह अनेक गायों वाले गोठ में जाता है. (३) अस्य वीरस्य बर्हिषि सुतः सोमो दिविष्टिषु. उक्थं मदश्च शस्यते.. (४) यजनीय दिवसों में यज्ञों में वीर मरुद्गणों के लिए सोम निचोड़ा जाता है एवं उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पढ़े जाते हैं. (४) अस्य श्रोषन्त्वा भुवो विश्वा यश्चर्षणीरभि. सूरं चित्सस्रुषीरिषः.. (५) समस्त शत्रुओं को पराजित करने वाले मरुद्गण यजमान की स्तुति सुनें एवं स्तोता को अन्न प्राप्त हो. (५) पूर्वीभिर्हि ददाशिम शरद्भिर्मरुतो वयम्. अवोभिश्चर्षणीनाम्.. (६) हे मरुद्गण! हम तुमसे अनेक वर्षों से रक्षित हैं एवं तुम्हें हव्य देते हैं. (६) सुभगः स प्रयज्यवो मरुतो अस्तु मर्त्यः. यस्य प्रयांसि पर्षथ.. (७) हे अतिशय यजनीय मरुद्गण! जिस यजमान का हव्य तुम स्वीकार करते हो, वह धनसंपन्न हो. (७) शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः. विदा कामस्य वेनतः.. (८) हे यथार्थबलसंपन्न नेता मरुतो! उन यजमानों की इच्छा पूरी करो जो तुम्हें लक्ष्य करके स्तुति मंत्र बोलते-बोलते पसीने से नहा उठे हैं एवं तुम्हारी कामना करते हैं. (८) यूयं तत्सत्यशवस आविष्कर्त महित्वना. विध्यता विद्युता रक्षः.. (९)