ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे यथार्थ शक्ति वाले मरुतो! तुम अपना उज्ज्वल महत्त्व प्रकट करके उपद्रवकारी राक्षसों को समाप्त करो. (९) गूहता गुह्यं तमो वि यात विश्वमत्रिणम्. ज्योतिष्कर्ता यदुश्मसि.. (१०) हे मरुद्गणो! सर्वत्र वर्तमान अंधकार को नष्ट करो, सबका भक्षण करने वाले राक्षसों को भगाओ एवं हमें मनचाहा प्रकाश दो. (१०) सूक्त—८७ देवता—मरुद्गण प्रत्वक्षसः प्रतवसो विरप्शिनोऽनानता अविथुरा ऋजीषिणः. जुष्टतमासो नृतमासो अञ्जिभिर्व्यानञ्ज्रे के चिदुस्रा इव स्तृभिः.. (१) शत्रुनाश में अति कुशल, प्रकृष्ट बलयुक्त, विविध जयघोषों से युक्त सर्वोत्कृष्ट, संघीभूत, यज्ञकर्त्ताओं द्वारा अतिशय सेवित, अवशिष्ट सोमरस का सेवन करने वाले, मेघ आदि के नेता मरुद्गण अपने शरीर पर धारण किए आभूषणों से आकाश में सूर्यकिरणों के समान चमकते हैं. (१) उपह्वरेषु यदचिध्वं ययिं वय इव मरुतः केन चित्पथा. श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते.. (२) हे मरुद्गणो! जिस प्रकार पक्षी आकाशमार्ग से शीघ्र चलते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे समीपवर्ती आकाश में जब चलते हुए बादलों को एकत्र करते हो तो मेघ तुम्हारे रथों से लिपटकर पानी बरसाने लगते हैं. इसी हेतु तुम अपनी पूजा करने वाले यजमानों पर मधु के समान स्वच्छ जल बरसाओ. (२) प्रैषामज्मेषु विथुरेव रेजते भूमिर्यामेषु यद्ध युञ्जते शुभे. ते क्रीळयो धुनयो भ्राजदृष्टयः स्वयं महित्वं पनयन्त धूतयः.. (३) जिस समय मरुद्गण शोभन जल की वर्षा के लिए बादलों को तैयार करते हैं, उस समय उठे हुए बादलों को देखकर धरती उसी प्रकार कांप उठती है, जिस प्रकार पतिविहीना नारी राजा आदि के उपद्रवों को देखकर कांपती है. इस प्रकार विहारशील, चंचल स्वभाव एवं चमकीले आयुधों वाले मरुद्गण पर्वत आदि को कंपित करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं. (३) स हि स्वसृतपृषदश्वो युवा गणो३ या ईशानस्तविषीभिरावृतः. असि सत्य ऋणयावानेद्योऽस्या धियः प्राविताथा वृषा गणः.. (४) स्वयं प्रेरित, सफेद बुंदकियों युक्त हरिणियों वाले, नित्य तरुण, असाधारण शक्तिसंपन्न, ebook converter DEMO Watermarks*