ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति. उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (९) हे इंद्र! तुम निचुड़े हुए सोम द्वारा सेवा करने वाले यजमान को शीघ्र ही बल प्रदान करते हो. (९) स्वादोरित्था विषूवतो मध्वः पिबन्ति गौर्यः. या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभसे वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (१०) श्वेत वर्ण गाएं रसयुक्त एवं सभी प्रकार के यज्ञों में व्यापक मधुर सोम का पान करती हैं. वे शोभा बढ़ाने के लिए कामवर्षी इंद्र के साथ चलती हुई प्रसन्न होती हैं. दूध देकर निवास करने वाली वे गाएं इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (१०) ता अस्य पृश्नायुवः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः. प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्रं हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (११) इंद्र को छूने की अभिलाषा करने वाली ये विभिन्न रंगों की गाएं इंद्र के पीने योग्य सोम को अपने दूध से मिश्रित कर देती हैं. ये गाएं इंद्र में ऐसा मद उत्पन्न करती हैं कि वे शत्रुनाशक वज्र को चला सकें. ये गाएं इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (११) ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः. व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्.. (१२) प्रकृष्ट ज्ञान युक्त ये गाएं अपना दूध पिलाकर इंद्र की शक्ति बढ़ाती हैं. ये शत्रुओं की जानकारी के लिए इंद्र के शत्रु-विनाश आदि कर्म पहले ही बता देती हैं. इस प्रकार ये इंद्र का अधिकार प्रदर्शित करती हैं. (१२) इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः. जघान नवतीर्नव.. (१३) प्रतिकूल शब्दरहित इंद्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों द्वारा बने हुए वज्र से वृत्र आदि राक्षसों को आठ से दस बार हराया था. (१३) इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्. तद्विदच्छर्यणावति.. (१४) इंद्र ने अश्व संबंधी दधीचि के पर्वत में छिपे हुए मस्तक को पाने की इच्छा की एवं शर्यणावति नामक तालाब में प्राप्त किया. (१४) अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्. इत्था चन्द्रमसो गृहे.. (१५) इस गतिशील चंद्रमंडल में जो तेज छिपा है, वे सूर्य की किरणें हैं, ऐसा जानो. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*