भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 309

इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते.. (३) नेतृत्व करने वाली उषाएं, शोभन कर्म करने वाले, सोमरस निचोड़ने एवं ऋत्विजों को दक्षिणा देने वाले यजमान के लिए समस्त अन्न प्रदान करती हुईं अस्त्रधारी योद्धाओं के समान अपने उपयोग द्वारा दूर तक के देशों को भी तेज से पूरित करती हैं. (३) अधि पेशांसि वपते नृतूरिवापोर्णुते वक्ष उस्रेव बर्जहम्. ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वती गावो न व्रजं व्युषा आवर्तमः.. (४) जिस प्रकार नाई बालों को काट देता है, उसी प्रकार उषाएं संसार से लिपटे हुए काले अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं. जिस प्रकार गौ दूध काढ़ने के समय अपना थन प्रकट करती है, उसी प्रकार उषाएं अपने सीने को प्रकट करती हैं. वे गोशाला में जाने वाली गायों के समान पूर्व दिशा में जाती हैं. (४) प्रत्यर्ची रुशदस्या अदर्शि वि तिष्ठते बाधते कृष्णमभ्वम्. स्वरुं न पेशो विदथेष्वञ्जञ्चित्रं दिवो दुहिता भानुमश्रेत्.. (५) उषा का दीप्यमान तेज पहले पूर्व दिशा में दिखाई देता है, इसके बाद सभी दिशाओं में फैल जाता है एवं काले रंग के अंधकार को दूर भगा देता है. जैसे अध्वर्यु यज्ञों में यूप को आज्य द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही उषाएं आकाश में अपना रूप दिखाती है एवं स्वर्गपुत्री बनकर तेजस्वी सूर्य की सेवा करती हैं. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति. श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजीगः.. (६) हम रात्रि के अंधकार के पार आ गए हैं. निशा के अंधकार का नाश करती हुई उषा समस्त प्राणियों को ज्ञान देती है. जिस प्रकार वशीकरण में समर्थ पुरुष धनी के समीप जाकर उसे प्रसन्न करने के लिए हंसता है, उसी प्रकार प्रकाश फैलाती हुईं उषाएं हंसती सी जान पड़ती हैं. सुंदर शरीर वाली उषाओं ने सबकी प्रसन्नता के लिए अंधकार का भक्षण किया है. (६) भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः. प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान्.. (७) हम गौतमवंशी तेजस्विनी एवं सत्य भाषण प्रेमियों का नेतृत्व करने वाली आकाशपुत्री उषा की स्तुति करते हैं. हे उषा! हमें पुत्र, पौत्र, दास, अश्व एवं गायों से युक्त अन्न प्रदान करो. (७) उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्गं रयिमश्वबुध्यम्. सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

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