भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

ये जो सूर्य की सात किरणें हैं, उन में मेरी नाभि संबद्ध है. आप्त्य ऋषि अर्थात् मैं यह जानता हूं और कुएं से निकलने के लिए सूर्यकिरणों की स्तुति करता हूं. हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (९) अमी ये पञ्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिवः. देवत्रा नु प्रवाच्यं सध्रीचीना नि वावृतुर्वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१०) आकाश में स्थित इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता—पांच कामवर्षी देव हमारे प्रशंसनीय स्तोत्र को एक साथ देवों के समीप ले जावें और लौट आवें. हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (१०) सुपर्णा एत आसते मध्य आरोधने दिवः. ते सेधन्ति पथो वृकं तरन्तं यह्वतीरपो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (११) सूर्य की रश्मियां सबको आवरण करने वाले आकाश में वर्तमान हैं. वे विशाल जल को पार करने वाले भेड़िए को रोकती हैं. हे धरती और आकाश! मेरी यह बात जानो. (११) नव्यं तदुक्थ्यं हितं देवासः सुप्रवाचनम्. ऋतमर्षन्ति सिन्धवः सत्यं तातान सूर्यो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१२) हे देवो! तुम में छिपे हुए नवीन, स्तुत्य एवं वर्णनीय बल के कारण बहने वाली नदियां जल प्रवाहित करती एवं सूर्य अपना नित्य वर्तमान तेज फैलाता है. हे धरती और आकाश! हमारी इस बात को जानो. (१२) अग्ने तव त्यदुक्थ्यं देवेष्वस्त्याप्यम्. स नः सत्तो मनुष्वदा देवान्यक्षि विदुष्टरो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१३) हे अग्नि! देवों के साथ तुम्हारी प्रशंसनीय प्राचीन बंधुता है एवं तुम अत्यंत ज्ञाता हो. मनु के यज्ञ के समान ही हमारे यज्ञों में भी बैठकर देवों की हवि के द्वारा पूजा करो. हे धरती और आकाश! हमारी यह बात जानो. (१३) सत्तो होता मनुष्वदा देवाँ अच्छा विदुष्टरः. अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१४) मनु के यज्ञ के समान हमारे यज्ञ में स्थित, देवों को बुलाने वाले, परम ज्ञानी, देवों में अधिक मेधावी अग्नि देव देवों को शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार हमारे हव्य की ओर प्रेरित करें. हे धरती और आकाश! हमारी यह बात जानो. (१४) ब्रह्मा कृणोति वरुणो गातुविदं तमीमहे. व्यूर्णोति हृदा मतिं नव्यो जायतामृतं वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*