भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 335

वरुण अनिष्ट का निवारण करते हैं. हम उन मार्गदर्शक वरुण से अभिमत फल मांगते हैं. हमारा स्तोता मन उन वरुण की मननीय स्तुति करता है. वे ही स्तुति योग्य वरुण हमारे लिए सच्चे बनें. हे धरती और आकाश! हमारी बात जानो. (१५) असौ यः पन्था आदित्यो दिवि प्रवाच्यं कृतः. न स देवा अतिक्रमे तं मर्तासो न पश्यथ वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१६) हे देवगण! जो सूर्य आकाश में सततगामी मार्ग के समान सबके द्वारा देखे जाते हैं, उनका अतिक्रमण तुम भी नहीं कर सकते. हे मानवो! तुम उन्हें नहीं जानते. हे धरती और आकाश! हमारी बात जानो. (१६) त्रितः कूपेऽवहितो देवान्हवत ऊतये. तच्छुश्राव बृहस्पतिः कृण्वन्नंहूरणादुरु वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१७) कुएं में गिरा हुआ त्रित ऋषि अपनी रक्षा के लिए देवों को बुलाता है. बृहस्पति ने उसे पाप रूप कुएं से निकालकर उसकी पुकार सुनी. हे धरती और आकाश! हमारी बात जानो. (१७) अरुणो मा सकृद्वृकः पथा यन्तं ददर्श हि. उज्जहीते निचाय्या तष्टेव पृष्ट्यामयी वित्तं मे अस्य रोदसी.. (१८) लाल रंग के वृक ने मुझे एक बार मार्ग में जाते हुए देखा. वह मुझे देखकर इस प्रकार ऊपर उछला, जिस प्रकार पीठ की वेदना वाला काम करते-करते सहसा उठ पड़ता है. हे धरती और आकाश! मेरे इस कष्ट को जानो. (१८) एनाङ्गूषेण वयमिन्द्रवन्तोऽभि ष्याम वृजने सर्ववीराः. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (१९) घोषणा योग्य इस स्तोत्र के कारण इंद्र का अनुग्रह पाए हुए हम लोग पुत्र, पौत्रों आदि के साथ संग्राम में शत्रुओं को हरावें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना का आदर करें. (१९) सूक्त—१०६ देवता—विश्वेदेव इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमूतये मारुतं शर्धो अदितिं हवामहे. रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन.. (१) हम रक्षा के लिए इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, मरुद्गण एवं अदिति को बुलाते हैं. निवासस्थान देने वाले शोभनदानयुक्त देव पापों से बचाकर हमारा उसी प्रकार पालन करें, ebook converter DEMO Watermarks*