भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

इमे नु ते रश्मयः सूर्यस्य येभिः सपित्वं पितरो न आसन्.. (७) हे वज्रबाहु इंद्र एवं अग्नि! धन लाओ, हमें दो एवं अपने कार्यों के द्वारा हमारी रक्षा करो. सूर्य की जिन रश्मियों द्वारा हमारे पूर्व पुरुष ब्रह्मलोक को गए थे, वे ये ही हैं. (७) पुरंदरा शिक्षतं वज्रहस्तास्माँ इन्द्राग्नी अवतं भरेषु. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (८) हे वज्रहस्त एवं असुरनाशक इंद्र और अग्नि! हमें धन दो एवं युद्धों में हमारी रक्षा करो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना की पूजा करें. (८) सूक्त—११० देवता—ऋभुगण ततं मे अपस्तदु तायते पुनः स्वादिष्ठा धीतिरुचथाय शस्यते. अयं समुद्र इह विश्वदेव्यः स्वाहाकृतस्य समु तृप्णुत ऋभवः.. (१) हे ऋभुओ! मैंने बार-बार अग्निष्टोम आदि का पहले अनुष्ठान किया है एवं इस समय पुनः कर रहा हूं. उस में तुम्हारी प्रशंसा के लिए अतिशय प्रसन्नताकारक स्तोत्र पढ़ा जा रहा है. इस यज्ञ में सभी देवों के लिए पर्याप्त सोमरस संपादित है. तुम स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में डाले गए सोम को पीकर तृप्त बनो. (१) आभोगयं प्र यदिच्छन्त ऐतनापाकाः प्राञ्चो मम के चिदापयः. सौधन्वनासश्चरितस्य भूमनागच्छत सवितुर्दाशुषो गृहम्.. (२) हे ऋभुओ! तुम प्राचीन काल में अपरिपक्व ज्ञान वाले एवं मेरे जातीय बंधु थे. उस समय तुमने उपभोग के योग्य सोमरस की इच्छा की थी. हे सुधन्वा के पुत्रो! उस समय तुमने अपने तप से उपार्जित महत्त्व द्वारा ऐसे सविता के घर गमन किया था, जिसे सोमपान दिया जा चुका था. (२) तत्सविता वोऽमृतत्वमासुवदगोह्यं यच्छ्रवयन्त ऐतन. त्यं चिच्चमसमसुरस्य भक्षणमेकं सन्तमकृणुता चतुर्वयम्.. (३) हे ऋभुओ! उस समय सविता ने तुम्हारे अभिमुख होकर अमरता दी थी, जिस समय तुम सबके द्वारा दृश्यमान सविता को अपनी सोमपान की इच्छा बताते हुए आए थे एवं त्वष्टा के सोमपान के साधन के चार टुकड़े कर दिए थे. (३) विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाघतो मर्तासः सन्तो अमृतत्वमानशुः. सौधन्वना ऋभवः सूरचक्षसः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः.. (४) ऋत्विजों के साथ मिले हुए ऋभुओं ने शीघ्र ही यज्ञ, दान आदि कर्म करके मरणधर्मा ebook converter DEMO Watermarks*