भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 352

हम प्रवृद्ध जटाधारी एवं वीरनाशक रुद्र के लिए ये मननीय स्तुतियां इसलिए अर्पित कर रहे हैं, जिससे द्विपद एवं चतुष्पद की रोगशांति हो. गांव में सब लोग पुष्ट तथा अनातुर रहें. (१) मृळा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते. यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु.. (२) हे रुद्र! हमारे निमित्त तुम सुखकारक बनी एवं हमें सुख प्रदान करो. हम नमस्कारपूर्वक वीरनाशक रुद्र की सेवा करते हैं. पिता मनु ने जो रोगशांति और निर्भयता प्राप्त की थी, हे रुद्र! तुम्हें नमस्कार करने पर हम भी उन्हें प्राप्त करें. (२) अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्वः. सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हविः.. (३) हे कामवर्षक रुद्र! हम वीरनाशक एवं मरुत् सहयोगी तुम्हारी कृपा देवयज्ञ के द्वारा पावें. हमारी प्रजाओं के सुख की इच्छा करते हुए तुम उनके समीप आओ. प्रजा को हानिरहित देखकर हम तुम्हारे लिए हव्य देंगे. (३) त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञसाधं वङ्ककविमवसे नि ह्वयामहे. आरे अस्मद्दैव्यं हेळो अस्यतु सुमतिमिद्वयमस्या वृणीमहे.. (४) हम रक्षा के निमित्त दीप्त, यज्ञसाधक, कुटिलगति एवं क्रांतदर्शी रुद्र को बुलाते हैं. रुद्र अपना दीप्त क्रोध दूर करें एवं हम उनकी शोभन कृपादृष्टि प्राप्त करें. (४) दिवो वराहमरुषं कपर्दिनं त्वेषं रूपं नमसा नि ह्वयामहे. हस्ते बिभ्रद्भेषजा वार्याणि शर्म वर्म च्छर्दिरस्मभ्यं यंसत्.. (५) हम वराह के समान दृढ़ांग, प्रकाशशील, जटाधारी, तेजोदीप्त एवं निरूपणजीव रुद्र को नमस्कार द्वारा बुलाते हैं. वे अपने हाथों में वरणीय ओषधियां धारण करते हुए हमें सुख, कवच एवं गृह प्रदान करें. (५) इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादोः स्वादीयो रुदाय वर्धनम्. रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ.. (६) मरुतों के पिता रुद्र को लक्ष्य करके हम स्वादिष्ट पदार्थों से भी मधुर एवं वृद्धिकारक स्तुति वचन बोल रहे हैं. हे मरणरहित रुद्र! हमें मानवों का भोजन प्रदान करो एवं अपने पुत्ररूप मेरी तथा मेरे पुत्र की रक्षा करो. (६) मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्. मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*