ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति. आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (१६) हे मनुष्यो! उठो, हमारे शरीर का प्रेरक जीव आ गया है. अंधकार चला गया एवं प्रकाश आ रहा है. उषा सूर्य के गमन के लिए रास्ता साफ करती है. हे उषा! हम उस देश में जाते हैं, जिसमें तुम अन्न की वृद्धि करती हो. (१६) स्यूमना वाच उदियर्ति वह्निः स्तवानो रेभ उषसो विभातीः. अद्या तदुच्छ गृणते मघोन्यस्मे आयुर्नि दीदिहि प्रजावत्.. (१७) स्तुतियों को वहन करने वाला स्तोता प्रकाशमान उषा की स्तुति करता हुआ सुव्यवस्थित वेद वचन बोलता है. हे धनस्वामिनी उषा! इसलिए आज इस स्तोता का रात्रि संबंधी अंधकार मिटाओ तथा हमें प्रजायुक्त धन दो. (१७) या गोमतीरुषसः सर्ववीरा व्युच्छन्ति दाशुषे मर्त्याय. वायोरिव सूनृतानामुदर्के ता अश्वदा अश्ववत्सोमसुत्वा.. (१८) गोसंपन्न एवं समस्त शूरों से युक्त जो उषाएं स्तुति वचन समाप्त होते ही हव्य देने वाले यजमान का वायु के समान शीघ्र अंधकार नष्ट करती हैं, वे ही अश्व देने वाली उषाएं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को व्याप्त करें. (१८) माता देवानामतितेरनीकं यज्ञस्य केतुर्बृहती विभाहि. प्रशस्तिकृद् ब्रह्मणे नो व्युच्छा नो जने जनय विश्ववारे.. (१९) हे देवों की माता एवं अदिति से प्रतिस्पर्धा करने वाली उषा! तुम यज्ञ का ज्ञापन करती हुई एवं महत्त्व प्राप्त करती हुई प्रकाशित एवं हमारे स्तोत्र की प्रशंसा करती हुई उदित बनो. हे वरणीय उषा! हमें संसार में प्रसिद्ध बनाओ. (१९) यच्चित्रमप्र उषसो वहन्तीजानाय शशमानाय भद्रम्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (२०) उषाएं जो विचित्र एवं प्राप्त करने योग्य धन लाती हैं, वह हवि देने वाले एवं स्तुति करने वाले पुरुष के लिए कल्याणकारी है. मित्र, वरुण, सिंधु धरती एवं आकाश इस प्रार्थना की पूजा करें. (२०) सूक्त—११४ देवता—रुद्र इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः. यथा शमसद्द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*