भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 360

हे नेता एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने दुर्दांत दस्युओं द्वारा कुएं के जल में डुबाए गए रेभ ऋषि को बाहर निकालकर उनका विकलांग शरीर घोड़े के समान अपनी दवाओं से ठीक किया था. तुम्हारे पूर्वकृत कार्य अभी पुराने नहीं हुए हैं. (४) सुषुप्व़ांसं न निर्ऋतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम्. शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय.. (५) हे दर्शनीयो! तुमने धरती के ऊपर सोए हुए मनुष्य के समान पड़े हुए, कुएं में पड़ने वाले सूर्यबिंब के समान तेजस्वी एवं शोभन स्वर्ण निर्मित अलंकार के समान दर्शनीय कूपपतित वंदन ऋषि को बाहर निकाला था. (५) तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्. शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम्.. (६) हे नेता रूप नासत्यो! अभीष्ट प्राप्ति के कारण कहे जाने वाले अनुष्ठान के समान ही मैं अंगिरावंशी कक्षीवान् तुम्हारे यज्ञ की प्रतिज्ञा करता हूं. तुमने वेगवान् घोड़ों के खुरों से निकले हुए मधु से अपेक्षित लोगों के लिए सैकड़ों घड़े भर दिए थे. (६) युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय. घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम्.. (७) हे नेताओ! कृष्ण के पुत्र विश्वकाय ने तुम लोगों की स्तुति की तो तुमने उसके खोए हुए पुत्र विष्णायु को लाकर दे दिया. हे अश्विनीकुमारो! कुष्ठ रोग के कारण पति को प्राप्त न करके अपने पिता के घर बैठी हुई एवं वृद्धावस्था को प्राप्त घोषा को तुमने पति प्रदान किया. (७) युवं श्यावाय रुशतीमदत्तं महः क्षोणस्याश्विना कण्व़ाय. प्रवाच्यं तद्वृषणा कृतं वां यन्नार्षदाय श्रवो अध्यधत्तम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने कोढ़ी श्याव ऋषि को उज्ज्वल त्वचा वाली स्त्री प्रदान की एवं दृष्टिरहित होने के कारण चलने में अशक्त कण्व को तेजपूर्ण नेत्र दिए. हे कामवर्षको! तुमने नृषद के बहरे पुत्र को कान प्रदान किए. तुम्हारे ये कार्य प्रशंसा के योग्य हैं. (८) पुरू वर्पांस्याश्विना दधाना नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम्. सहस्रसां वाजिनमप्रतीतमहिहनं श्रवस्यं1 तरुत्रम्.. (९) हे बहुरूपधारी अश्विनीकुमारो! तुमने पेदु ऋषि को शीघ्रगामी सहस्र संख्या वाले धन का दाता, बलवान्, शत्रुओं द्वारा जीतने में अशक्य, शत्रुहंता, स्तुतिपात्र एवं रक्षक अश्व दिया था. (९) ebook converter DEMO Watermarks*