भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 361

एतानि वां श्रवस्या सुदानू ब्रह्माङ्गूषं सदनं रोदस्योः. यद्द्वां पज्रासो अश्विना हवन्ते यातमिशा च विदुषे च वाजम्.. (१०) हे शोभनदानशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे वीर-कार्य सबके जानने योग्य हैं. धरती और आकाश के रूप में वर्तमान तुम दोनों की स्तुति प्रसन्नतादायक एवं घोषणा करने योग्य है. अंगिरागोत्रीय यजमान तुम्हें जब-जब बुलावें, तब-तब देने योग्य अन्न लेकर आओ एवं तुम्हारी स्तुति जानने वाले मुझको बल प्रदान करो. (१०) सूनोर्मनेनाश्विना गृणाना वाजं विप्राय भुरणा रदन्ता. अगस्त्ये ब्रह्मणा वावृधाना सं विस्पलां नासत्यारिणीतम्.. (११) हे पोषणकर्त्ता एवं सत्य स्वभाव वाले अश्विनीकुमारो! तुमने कुंभ से उत्पन्न अगस्त्य ऋषि की स्तुतियों का विषय बनकर मेधावी भरद्वाज ऋषि को अन्न दिया एवं मंत्रों से वृद्धि पाकर तुमने विष्पला की जंघा को तोड़ा. (११) कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा. हिरण्यस्येव कलशं निखातमूदूथुर्दशमे अश्विनाहन्.. (१२) हे सूर्यपुत्र एवं कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुम किस निवासस्थान में वर्तमान काव्य की शोभन स्तुति सुनने जाते हो? जिस प्रकार सोने से भरे एवं धरती में गड़े कलश को कोई जानकार ही निकालता है, उसी प्रकार तुमने कुएं में पड़े रेभ ऋषि को दसवें दिन बाहर निकाला था. (१२) युवं च्यवानमश्विना जरन्तं पुनर्युवानं चक्रथुः शचीभिः. युवो रथं दुहिता सूर्यस्य सह श्रिया नासत्यावृणीत.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने ओषधि दान के कार्य द्वारा वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा बनाया. हे सत्य स्वभावो! सूर्य की पुत्री संपत्ति के साथ तुम्हारे रथ पर चढ़ी थी. (१३) युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवैः पुनर्मन्यावभवतं युवाना. युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुऋञ्जेभिरश्वैः.. (१४) हे दुःखनिवारको! तुम जिस प्रकार प्राचीन समय में तुग्र के स्तुतिपात्र थे, उसी प्रकार बाद में भी स्तुतिपात्र रहे. तुम सेना के साथ डूबे हुए भुज्यु को अधिक जलयुक्त सागर में गमनशील नौकाओं एवं शीघ्रगति वाले अश्वों द्वारा ले आए थे. (१४) अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्हः समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्. निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति.. (१५) हे अश्विनीकुमारो! तुग्र द्वारा समुद्र में भेजे गए एवं जल में डूबे हुए भुज्यु ने ebook converter DEMO Watermarks*