ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे क्रोधहीन ऋत्विजो! तुम कर्मों का फल देने वाले रुद्र को पालक एवं यज्ञसाधन अन्न अधिक मात्रा में दो. मैं स्वर्ग के देव रुद्र तथा उनके अनुचरों एवं आकाश और धरती के बीच निवास करने वाले मरुद्गण की स्तुति करता हूं. रुद्र अपने वीरों अर्थात् मरुतों की सहायता से शत्रुओं को उसी प्रकार भगा देते हैं, जैसे तूणीर में रहने वाले बाणों द्वारा शत्रु को भगाया जाता है. (१) पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने. स्तरीनार्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः.. (२) जिस प्रकार पत्नी पति की पहली पुकार सुनकर शीघ्र दौड़ती आती है, उसी प्रकार दिवस एवं रात्रि नामक देवता अनेक प्रकार की स्तुतियों से ज्ञायमान होकर हमारे पहले आह्वान पर शीघ्र आवें. उषादेवी शत्रुनाशक सूर्य के समान सुनहरी किरणों से युक्त होकर एवं महान् रूप धारण करके आवें. उषा सूर्य की शोभा को धारण करे. (२) ममत्तु नः परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्. शिशीतमन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः.. (३) निवास के योग्य एवं सर्वत्र गतिशील सूर्य हमें प्रसन्न करें. जल बरसाने वाला वायु हमें प्रमुदित करे. इंद्र एवं मेघ हमारी वृद्धि करें. इस प्रकार विश्वेदेव हमें पर्याप्त अन्न प्रदान करें. (३) उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै. प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः.. (४) हे ऋत्विजो! उषिज के पुत्र मुझ कक्षीवान् के कल्याण के लिए यज्ञीय अन्न के भक्षक, सोमपानकर्ता एवं स्तुति के योग्य अश्विनीकुमारों को विश्वप्रकाशक उषाकाल में बुलाओ. तुम जल के नाती अग्नि की स्तुति करो. मुझ जैसे व्यक्तियों की मातृतुल्य अहोरात्र देवताओं की भी स्तुति करो. (४) आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे. प्र वः पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्नेः.. (५) हे देवगण! उषिज का पुत्र मैं कक्षीवान् आपको बुलाने के लिए आपके अनुकूल स्तोत्र का पाठ करता हूं. हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार ब्रह्मवादिनी महिला घोषा ने अपने श्वेत कुष्ठ रोग के विनाश के लिए तुम्हारी स्तुति की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं फल देने वाले पूषा एवं धन देने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (५) श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम्. श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्भिः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*