भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 371

अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्. त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहम्.. (११) हे इंद्र! विशाल शक्तिसंपन्न एवं सर्वत्र व्यापक धरती और आकाश ने तुम्हें वृत्रवध के पश्चात् प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने सर्वत्र वर्तमान एवं शोभन आहार वाले वृत्र असुर को महान् वज्र से मारकर पानी में गिरा दिया. (११) त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नॄन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान्. यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम्.. (१२) हे मानव हितकारी इंद्र! तुम जिन अश्वों की रक्षा करते हो, उन वायु तुल्य शीघ्रगामी एवं शोभन रथ में जुते हुए अश्वों पर आरोहण करो. कविपुत्र उशना द्वारा प्रदत्त मदकारक वज्र को तुमने वृत्रघातक एवं शत्रु अतिक्रमणकारी के रूप में तेज किया है. (१२) त्वं सूरो हरितो रामयो नॄन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र. प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयोऽयज्यून्.. (१३) हे इंद्र! सूर्य रूप में अपने हरि नामक घोड़ों को रोको. एतश नाम का घोड़ा तुम्हारे रथ का पहिया आगे चलाता है. तुम नाव द्वारा पार होने योग्य नब्बे नदियों के पार जाकर यज्ञविहीन असुरों के पास पहुंचो एवं उन्हें कर्त्तव्य में लगाओ. (१३) त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके. प्र नो वाजान्रथ्यो३ अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै.. (१४) हे वज्रधारणकर्त्ता! इस शक्तिशाली दरिद्रता से हमारी रक्षा करो, समीपवर्ती संग्राम में हमें पाप से बचाओ तथा कीर्ति एवं सत्यभाषण के निमित्त रथ एवं अश्वयुक्त धन प्रदान करो. (१४) मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमहः समिषो वरन्त. आ नो भज मघवन्गोष्त्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमादः स्याम.. (१५) हे संपत्तियों के कारण पूजनीय इंद्र! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि हमसे अलग न हो. हे मघवन्! तुम धन के स्वामी हो, हमें गाय प्राप्त कराओ. तुम्हारी विशाल स्तुतियों से वृद्धि प्राप्त करने वाले पुत्र-पौत्रादि के साथ आनंदित हों. (१५) सूक्त—१२२ देवता—विश्वेदेव प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळहुषे भरध्वम्. दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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