भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 387

हे इंद्र! तुम मनुष्यों एवं मरुतों के साथ प्रसिद्ध युद्धों में शत्रु का संहार करने में प्रसिद्ध हो एवं शूरों के साथ संग्राम सुख का अनुभव करने वाले हो. स्तुति करने वाले ऋत्विजों को तुम अन्न देते हो. जिस प्रकार मनुष्य घोड़े की सेवा करता है, उसी प्रकार ऋत्विज् गतिशील एवं अन्नदाता इंद्र की सेवा करते हैं. तुम हमारा आह्वान सुनो. (२) दस्मो हि ष्मा वृषणं पिन्वसि त्वचं कं चिद्यावीररुरूं शूर मर्त्यं परिवृणक्षि मर्त्यम्. इन्द्रोत तुभ्यं तद्दिवे तद्रुद्राय स्वयशसे. मित्राय वोचं वरुणाय सप्रथः सुमृळीकाय सप्रथः.. (३) हे इंद्र! तुम शत्रुसंहारक हो. इसीलिए तुम जलधारी मेघ का त्वचा के समान भेदन करके जल गिराते हो एवं चलते हुए मेघ को मनुष्य के समान पकड़कर बरसने के लिए विवश कर देते हो. हे इंद्र! तुम्हारे इस कार्य को हम तुमसे, आकाश से, यशसंपन्न रुद्रों से, प्रजाओं को सुख देने वाले मित्र एवं वरुण से कहेंगे. (३) अस्माकं व इन्द्रमुश्मसीष्टये सखायं विश्वायुं प्रासहं युजं वाजेषु प्रासहं युजम्.. अस्माकं ब्रह्मोतयेऽवा पृत्सुषु कासु चित्. नहि त्वा शत्रुः स्तरते स्तृणोषि यं विश्वं शत्रुं स्तृणोषि यम्.. (४) हे ऋत्विजो! हम अपने यज्ञ में अपने मित्र, समस्त यज्ञों में पहुंचने वाले, शत्रुनाशक, अपने सहायक, यज्ञ में विघ्न डालने वालों को पराजित करने वाले एवं मरुद्गणों के साथ रहने वाले इंद्र को चाहते हैं. हे इंद्र! हमारी रक्षा के लिए हमारे यज्ञ का पालन करो. युद्धक्षेत्र में तुम सभी शत्रुओं का संहार करते हो. कोई भी शत्रु तुम्हारा सामना नहीं करता. (४) नि षू नमातिमतिं कयस्य चित्तेजिष्ठाभिररणिभिर्नोतिभिरुग्राभिरुग्रोतिभिः. नेषि णो यथा पुरानेनाः शूर मन्यसे. विश्वानि पूरोरप पर्षि वह्निरासा वह्निर्नो अच्छ.. (५) हे बलसंपन्न इंद्र! जो तुम्हारे भक्त यजमान के विरुद्ध आचरण करते हैं, उन्हें तुम रक्षण संबंधी अपने तेज से अवनत कर देते हो. तुम प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों को जिन यज्ञमार्गों से ले गए थे, उन्हीं से हमें भी ले जाओ. तुम्हें सब लोग पापहीन एवं जगत्पालक मानते हैं. तुम यज्ञस्थल में हमें यज्ञफल दो एवं अनिष्टों को समाप्त करो. (५) प्र तद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इषवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति. स्वयं सो अस्मदा निदो वधैरजेत दुर्मतिम्. अव स्रवेदघशंसोऽवतरमव क्षुद्रमिव स्रवेत्.. (६) हम वर्धनशील इंद्र के लिए स्तुति करते हैं. जिस प्रकार आह्वान के योग्य एवं राक्षसहंता इंद्र हमारे बुलाने पर आते हैं, उसी प्रकार इंद्र अभिलाषापूर्वक हमारे यज्ञकर्म के प्रति आगमन करते हैं एवं हमारे बुद्धिहीन निंदकों को वध के उपायों द्वारा दूर कर देते हैं. जिस प्रकार जल ebook converter DEMO Watermarks*