भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 386

आशा से यजमान को नहीं त्यागते. हे अग्नि! तुम हवि के इच्छुक सभी देवों के लिए हवि वहन करते हो. अग्नि उत्तम कर्म करने वाले मनुष्यों के लिए उत्तम धन देते हैं एवं स्वर्ग का द्वार खोलते हैं. (६) स मानुषे वृजने शन्तमो हितोऽग्निर्यज्ञेषु जेन्यो न विशपतिः प्रियो यज्ञेषु विशपतिः. स हव्या मानुषाणामिळा कृतानि पत्यते. स नस्त्रासते वरुणस्य धूर्तेर्महो देवस्य धूर्तेः.. (७) मनुष्य पापों के निवारण के लिए जो यज्ञ करता है, उस में अग्नि सहायक हैं. ये विजयी राजा के समान यज्ञस्थल में मनुष्य के पालक एवं प्रिय हैं. यजमान यज्ञवेदी पर जो हवि एकत्रित करता है, अग्नि उसी को स्वीकार करने के लिए आते हैं. अग्नि यज्ञ में बाधा पहुंचाने वाले और हमारी हिंसा करने वाले व्यक्तियों के भय से तथा महान् पापों से हमारी रक्षा करें. (७) अग्निं होतारमीळते वसुधितिं प्रियं चेतिष्ठमरतिं न्येरिरे हव्यवाहं न्येरिरे. विश्वायुं विश्ववेदसं होतारं यजतं कविम्. देवासो रण्वमवसे वसूयवो गीर्भी रण्वं वसूयवः.. (८) ऋत्विज् यज्ञसंपन्नकर्त्ता, धन धारण करने वाले, सर्वप्रिय, बुद्धिदाता एवं नित्य प्रज्वलित अग्नि की स्तुति करते हैं एवं भली-भांति सुख प्राप्त करते हैं. अग्नि हव्यवाही, समस्त प्राणियों के जीवन, परम बुद्धि संपन्न, देवों को बुलाने वाले, यजनीय एवं सर्वज्ञ हैं. यजमान धन की इच्छा से अग्नि को हव्य देना चाहते हैं एवं आश्रय पाने वाले की इच्छा से शब्द करने वाले एवं रमणीय अग्नि को प्राप्त करते हैं. (८) सूक्त—१२९ देवता—इंद्र यं त्वं रथमिन्द्र मेधसातयेऽपाका सन्तमिषिर प्रणयसि प्रानवद्य नयसि. सद्यश्चित्तमभिष्टये करो वशश्च वाजिनम्. सास्माकमनवद्य तूतुजान वेधसामिमां वाचं न वेधसाम्.. (१) हे यज्ञगामी एवं अनिंदित इंद्र! यज्ञ लाभ के लिए तुम अधिक ज्ञानसंपन्न यजमान के पास जाते हो और धन, विद्या आदि से उसे उन्नत बनाते हो. उसे तुरंत सफल-मनोरथ एवं अन्नयुक्त कर दो. हे इंद्र! तुम समस्त पुरोहितों में उत्तम हो. जिस शीघ्रता से तुम हमारी स्तुति स्वीकार करते हो, उसी शीघ्रता से हमारे द्वारा दिया हुआ हवि भी ग्रहण करो. (१) स श्रुधि यः स्मा पृतनासु कासु चिद्धक्षाय्य इन्द्र भरहूतये नृभिरसि प्रतूर्तये नृभिः. यः शूरैः स्व१ः सनिता यो विप्रैर्वाजं तरुता. तमीशानास इरधन्त वाजिनं पृक्षमत्यं न वाजिनम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*