भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 385

हमारा स्तोत्र यज्ञ और घृत से युक्त तथा नम्रतासंपन्न है. हम इस स्तोत्र द्वारा अग्नि की तब तक सेवा करते हैं, जब तक वे संतुष्ट न हो जावें. अग्नि हव्यसंपन्न देवयज्ञ को पूर्ण करने में सहायता करते हैं. हमारे हव्य को स्वीकार करने से अग्नि का नाश नहीं होगा. जिस प्रकार मातरिश्वा मनु के निमित्त अग्नि को दूर से लाए और उसे जलाया, उसी प्रकार अग्नि दूर देश से हमारे यज्ञ में आवें. (२) एवेन सद्यः पर्येति पार्थिवं मुहुर्गी रेतो वृषभः कनिक्रदद्दध्रेतः कनिक्रदत्. शतं यक्षाणो अक्षभिर्देवो वनेषु तुर्वणिः. सदो दधान उपरेषु सानुष्वग्निः परेषु सानुषु.. (३) अग्नि की सदा स्तुति की जाती है. वे अन्नयुक्त, कामवर्षी, सामर्थ्यशाली एवं शब्द करने वाले हैं. वे हमारे आह्वान के तुरंत बाद ही वेदी के चारों ओर चलने लगते हैं. वे ग्रहण करने योग्य स्तोत्रों के कारण अपनी ज्वालाओं द्वारा यजमान के कार्य को सौगुना प्रकाशित करते हैं. उच्चस्थान प्राप्त अग्नि यज्ञ को सदा घेरे रहते हैं. (३) स सुक्रतुः पुरोहितो दमेदमेऽग्निर्यज्ञस्याध्वरस्य चेतति क्रत्वा यज्ञस्य चेतति. क्रत्वा वेधा इष्यते विश्वा जातानि पस्पशे. यतो घृतश्रीरतिथिर्जायत वह्निर्वेधा अजायत.. (४) शोभनकर्मा एवं यज्ञनिष्पादक अग्नि प्रत्येक यजमान के घर में नाशरहित यज्ञ को जानते हैं एवं विविध कर्मों के फलदाता बनकर यजमान को अन्न देने की इच्छा करते हैं. अग्नि घृतसेवी अतिथि के रूप में उत्पन्न होने के कारण संपूर्ण हव्य को स्वीकार करते हैं. अग्नि के प्रज्वलित होने पर यजमान को बहुत से फल मिलते हैं. (४) क्रत्वा यदस्य तविषीषु पृञ्चतेऽग्नेर्वेण मरुतां न भोज्येषिराय न भोज्या. स हि ष्मा दानमिन्वति वसूनां च मज्मना. स नस्त्रासते दुरितादभिहुतः शंसादघादभिहुतः... (५) वायु द्वारा मेघों से वर्षा किए जाने पर जिस प्रकार सभी अन्न समान रूप से पकते हैं अथवा याचक को जिस प्रकार सभी भक्षणीय द्रव्य दिए जाते हैं, उसी प्रकार यजमान अग्नि को तृप्त करने के लिए उसकी ज्वालाओं में पुरोडाश आदि द्रव्य मिलाते हैं. यजमान अपने धन के अनुसार हव्य देता है. अग्नि हमें दुःखद एवं हिंसक पाप से बचावें. (५) विश्वो विहाया अरतिर्व्युर्दधे हस्ते दक्षिणे तरणिर्न शिश्रथच्छ्रवस्यया न शिश्रथत्. विश्वस्मा इदिष्यते देवत्रा हव्यमोहिषे. विश्वस्मा इत्सुकृते वारमृण्वत्यग्निर्द्वारा वृण्वति.. (६) सर्वगंतव्य, महान् एवं नित्य गतिशील अग्नि देने की इच्छा से सूर्य के समान दक्षिण हाथ में धन रखते हैं. वह हाथ यज्ञ करने वाले के लिए सदा ढीला रहता है. अग्नि हवि पाने की ebook converter DEMO Watermarks*

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