भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 384

एवं तुम्हारा यज्ञ परम यशस्वी होता है. हे जरारहित एवं भक्तों की जरा का निवारण करने वाले अग्नि! यजमान दूतों के समान तुम्हारी सेवा करते हैं. (९) प्र वो महे सहसा सहस्वत उषर्बुधे पशुषे नाग्नये स्तोमो बभूत्वग्नये. प्रति यदीं हविष्मान्विश्वासु क्षासु जोगुवे. अग्रे रेभो न जरत ऋषूणां जूर्णिर्होत ऋषूणाम्.. (१०) हे स्तुतिकर्त्ताओं! यजमान अग्नि को लक्ष्य करके वेदी की भूमि पर इधर-उधर गमन करते हैं. तुम्हारी स्तुति पूजनीय, शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाली, प्रातःकाल जागरणशील एवं पशुदाता अग्नि को प्रसन्न करने वाली हो. बंदीजन जिस प्रकार धनियों की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार स्तुतिकुशल होता देवों में श्रेष्ठ अग्नि की स्तुति सबसे पहले करता है. (१०) स नो नेदिष्ठं ददृशान आ भराग्ने देवेभिः सचनाः सुचेतुना महो रायः सुचेतुना. महि शविष्ठ नस्कृधि सञ्चक्षे भुजे अस्यै. महि स्तोतृभ्यो मघवन्त्सुवीर्यं मथीरुग्रो न शवसा.. (११) हे अग्नि! तुम हमें अपने समीप दिखाई देते हुए भी देवों के साथ हव्य का भोग करते हो. तुम भक्तों के प्रति अनुग्रह भरे शोभन चित्त से पूजनीय धन लाते हो. हे बलसंपन्न अग्नि! पृथ्वी का दर्शन एवं भोग करने के लिए हमें अधिक अन्न दो. हे धनस्वामी अग्नि! स्तोताओं को पुत्रभृत्ययुक्त धन प्रदान करो. तुम परम बली एवं क्रूर व्यक्ति के समान हमारे शत्रुओं को नष्ट करो. (११) सूक्त—१२८                  देवता—अग्नि अयं जायत मनुषो धरीमणि होता यजिष्ठ उशिजामनु व्रतमग्निः स्वमनु व्रतम्. विश्वश्रुष्टिः सखीयते रयिरिव श्रवस्यते. अदब्धो होता नि षददिळस्पदे परिवीत इळस्पदे.. (१) देवों का आह्वान करने वाले एवं यजन योग्य अग्नि फल की कामना करने वालों एवं हवि का भोजन करने के निमित्त मनुष्य द्वारा अरणि से उत्पन्न होते हैं. समस्त सुखों के कर्त्ता अग्नि मित्रता चाहने वाले एवं प्रसिद्ध अन्न की इच्छा करने वाले यजमान के लिए धन के समान हैं. यज्ञवेदी धरती के उत्तम स्थान में है. वहां शक्तिसंपन्न एवं यज्ञकर्त्ता अग्नि ऋत्विजों से घिरे बैठे हैं. (१) तं यज्ञसाधमपि वातयामस्यूतस्य पथा नमसा हविष्मता देवताता हविष्मता. स न ऊर्जामुपाभृत्यया कृपा न जूर्यति. यं मातरिश्वा मनवे परावतो देवं भाः परावतः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*